Sunday, October 19, 2008

मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ 

पांचवी कक्षा की एक क्लास मे मास्टर ने बच्चों से पूछा
बताओ क्या बनोगे, कैसे  करोंगे अपने माँ-बाप का नाम ऊँचा
किसी ने IAS. किसी ने PCS. किसी ने कहा अच्छा  आदमी बनाना चाहता हूँ
तभी पीछे की सीट से उठकर एक बच्चे ने कहा
Sir! मैं  इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ

ऐसे जवाब की ख्वाब मे भी नही की थी कभी कल्पना
पर Teacher को लगा शायद हो ये  लडके का बचपना
समझाया की बेटा गलती की है तुने Career को चुनने मे
ये तो बता  क्या प्रॉब्लम है तुझे और कुछ बनने मे ???

लड़का बोला Sir! जॉब मे अभी कहाँ इतना पैसा है
और Business करना मुझे लगता  बेवकूफों जैसा है
नेता फस जाते हैं Akshar स्टिंग ऑपरेशन के जंजाल मे
खेल मे Zahar भर दिया मैच फिक्सिंग के बवाल ने
पर फ़िल्म इंडस्ट्री मे प्रोफिट की लाइन  हमेशा ऊपर चढ़ती है
बढ़िया काम से Price-Value तो बुरे से Popularity बढ़ती  है
और इस बात को तो ख़ुद कई बड़े फ़िल्म समीक्षक माने है
MMS Clips से भी  ज्यादा बिकते इमरान के फिल्मो के गाने है

मै भी ऐसे गाने कर अपनी लाइफ बदलना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी  बनाना चाहता हूँ

हुंह!!!! आज कल के लडके जाने पढ़ते हैं किस किताब से
Teacher का भी सर चक्र  गया बच्चे के इस जवाब से
Teacher ने फ़िर भी पूछा उसमे ऐसी क्या बात समाई  है
ये तो बता अभिषेक बच्चन बनने मे क्या बुराई है ???

सिर्फ़ दो फिल्मो से इतना नाम नही कमाया अभिषेक के बाप ने
Murder किया  लड़किया फ़िर भी कहती .Aashiq Banaya Aap Ne…
मल्लिका, तनुश्री, उदिता निपटी पिछली  फिल्मों की साइन मे
सुनाने मे आया है की अब सेलिना हृषिता भी है लाइन मे

मै भी ऐसे टेस्टी CHOCOLATE का स्वाद चखाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir मैं  इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ

अब मास्टर का गुस्सा पहुच गया सातवे आसमान पे
बोले.. सिवाय लड़किया घुमाने के  क्या किया इमरान ने ??
Sir! लड़कियों को पीछे घुमाना कोई आसान काम नही
वरना  बड़े Powerful लोगो का होता ये अंजाम नहीं

क्या नही जानते आप America के पूर्व राष्ट्रपति को ??
कैसे प्राप्त हुए  मोनिका के चक्कर मे .वीरगति को
बदल गया कप्तान देश का सौरभ-नग्मा के टक्कर मे
Cricket खेलना भूल गया वो .नए खेल के चक्कर मे
मेरी इतनी बातों का मतलब  बिलकुल सीधा-साफ है
काबिलियेत मे भी इमरान हाशमी. बिल क्लिंटन का बाप है

मैं भी एक Demanded और काबिल आदमी बनाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान  हाशमी बनाना चाहता हूँ

Sunday, October 19, 2008 3:23:56 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

दोस्तो॥ कुछ लो काज़ल "काज़ु" को जानते होंगे। ये मेरी एक महिला मित्र है। हां आप सब लोग यही सोचेंगे की मित्रता भी ऐसी लडकी से.... नीचे लिखे को पढ लीजिये,,, और फ़िर कहीयेगा॥

यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को
आज चला था पैसो से मैं यौवन  का सुख पाने को

दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे
अरमानों के साथ मैं पंहुचा  उस तड़ीता के दरवाजे पे

अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने था घेर लिया

हर कोई अपने यौवन के श्रृंगार से सुसज्जित था
पर अब जाने क्यों मेरा मॅन थोडा  सा लज्जित था

आहत होता था हृदय बहुत उन संबोधन के तीरों से
पर अभी भी मॅन था बंधा हुआ  संवेगों की जंजीरों से

तभी एक रूपसी पर अटकी मेरी दृष्टि थी
लगता था मानो स्वयं वही सुन्दरता की  सृष्टि थी

व्यग्र हुआ मॅन साथ में उसके स्वयं चरम सुख पाने को
उस कनकलता को लिए चला  अपनी कामाग्नि बुझाने को

जून के उष्ण महीने में बसंती सी हो गयी थी रुत
कुछ ऐसे अपने तन को उसने मेरे  समुख किया प्रस्तुत

खुला निमंत्रण था सपनो को आलिंगन में भरने का
पर नहीं समझ पा रहा था कारण  अपने अंतस के डरने का

अंतस को अनदेखा कर के प्रथम स्पर्श किया तन को
उस मद से ज्यादा मद-मादित अब  तक कुछ नहीं लगा मॅन को

खुद अंग ही इतने सुंदर थे लज्जा आ जाये गहनों को
पर सहसा सहम गया देख उस  मृग-नयनी के नयनो को

आँखों में कोई चमक नहीं चेहरे पे कोई भाव नहीं
सपने  कोई छीन गया जैसे जीने कोई चाह नहीं

प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों ने सारा मद तोड़ दिया पल में
व्याकुल था अंतस जानने को क्या है इसके हृदयातल में

उसे देख अवस्था में ऐसी जब रहा नहीं गया मुझसे
जो  उबल रहा था अंतस में वो सब कुछ बोल दिया उससे

आँखे सूना चेहरा सूना क्यों सूना तेरा जीवन  है
इच्छाओं के संसार में क्यों अब लगता नहीं तेरा मॅन है

सिर्फ तन का मूल्य दिया हूँ मैं, मॅन पर मेरा अधिकार  नहीं
पर इतना तो बता ऐ कनकलता क्या तुझको मैं स्वीकार्य नहीं

हे कामप्रिया!,हे मृगनयनी! ऐसी क्या विवशता है  तुझको
जो मॅन से मेरे साथ नहीं फिर तन क्यों सौप दिया मुझको

शांत भाव से बोली वो यहाँ मॅन को कौन समझता है
एक  लड़की के लिए गरीबी ही उसकी सबसे बड़ी विवशता है

इतना कह के फिर शांत हो गयी कुछ समझ नहीं आया  मुझको
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों से फिर मैंने झक-झोर दिया उसको

लड़ना ही जीवन है चाहे मुश्किल कितनी भी ज्यादा  हो
फिर नारी हो के क्यों तोड़ दिया तुमने अपनी मर्यादा को

कमी नहीं दुनिया में काम की पैसे इज्जत से कमाने  को
फिर क्यों बेच दिया खुद को बस अपनी क्षुधा मिटाने को ?

तड़प उठी वो मेरे ऐसे प्रश्नों के आघातों से
मुझसे  बोली क्या समझाना चाहते हो इन बातों से

शौक नहीं था वेश्या बन बाज़ारों में बिक जाने  का
अपने ही हाथों से खुद अपना आस्तित्व मिटाने का

पर आँखों के सारे सपने एक रोज बह गए पानी में
जब  माँ-बाप,घर-आँगन सब खो गए सुनामी में

फिर एक ही रात में बदल गयी मेरी दुनिया की तस्वीर  यहाँ
कठपुतली बना के बहुत नचाई मुझको मेरी तक़दीर यहाँ

दिन अच्छे हो जाते हैं राते भी अच्छी लगती हैं
भरे  पेट को सिद्धांत की हर बातें अच्छी लगती हैं

पर मई-जून की गर्मी से जब देह झुलसने लगती है
रोटी  के टुकड़े खोज रही आँखे कुछ थकने लगती हैं

भूख की आग में तड़प-तड़प मुश्किल से दिन कट पाते  हैं
अपनी बेबसी में घुट-घुट कर सपनों को जलाती रातें है

जब नीली छत के सिवा सर पर कोई और छत नहीं होती  है
कपडो के छेदों से झाँक रही मजबूरी खुद पे रोती है

गिद्धदृष्टि से देहांश देखता जब कोई चीर-सुराखों  से
तब मॅन छलनी हो जाता है तीर विष बुझे लाखों से

जब इन हालातों से लड़ लड़ कर जवानी थकने लगती है
तब  मर्यादा और सम्मान की ये बातें बेमानी लगने लगतीं है

लोगो ने जाने कितनी बार मन को निर्वस्त्र कर डाला  था
पर फिर भी किसी तरह मैंने अपना तन संभाला था

पर एक दिन कुचल गयी कली कुछ मदमाते क़दमों से
कुछ  और नहीं अब बाकी था इन किस्मत के पन्नों में

खुद को ख़त्म कर लेने का निश्चय कर लिया मेरे मॅन  ने
पर लाख चाहने पर भी दिल का साथ नहीं दिया हिम्मत ने

पर जीने का मतलब मेरे लिए हर मोड़ पर एक समझौता  था
फिर इस जगह से ज्यादा गया गुजरा मेरे लिए क्या हो सकता था

इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता  था
लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था

उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई  थी
दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थी

पर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला मैंने
हर  अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने

पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों  को
नहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को

क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन  को
क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को

काश कि मैं भी किसी को प्राणों से प्यारा कह  पाती
काश कि मैं भी किसी के हृदयातल में रह पाती

काश कि मेरे आँचल में भी एक अंश मेरा अपना  होता
ममता से पागल हो जाती एक बार जो मुझको माँ कहता

इतना कहते कहते ही उसकी आँखे भर आई थी
मैं भी था  खामोश वहाँ बस एक उदासी छाई थी

फिर मुझमे हिम्मत ही नहीं थी उससे कुछ कह पाने  को
धीमे क़दमों से लौट गया वापस गंतव्य पे जाने को

सोचता रहा ये रास्ते भर होके मानववृत्ति के अधीन
वो  चरित्रहीन थी या फिर दुनिया ही है चरित्रहीन

Sunday, October 19, 2008 3:17:54 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कितना अच्छा होता जो चांद की जगह तेरा चेहरा आता,
रात मे भी आकाश में दिन से ज्यादा उजाला छा जाता,
मेरी ये आँखें न सुखती बिन तेरे तुझे देखते के लिये,
रात को बेचैन होने के बजाय तेरी आँखों में ही खो जाता

---------------------------------------------

Sunday, October 19, 2008 3:11:25 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Wednesday, October 15, 2008

एक दाह संस्कार में अजीब घटना देखी गई। स्त्री के शव के पीछे रोता हुआ पति, पीछे एक कुत्ता और उसके पीछे सैकड़ों आदमियों की लम्बी लाइन।

एक आदमी ने उत्सुकतावश रोते हुए आदमी से कहा, भाई क्या हुआ ये लोग इस तरह लाइन में क्यों चल रहे हैं?

पति- मेरी पत्नी का देहांत कुत्ते के काटने से हुआ। लोगों की लाइन एक बार कुत्ते को अपने-अपने घर ले जाने के लिए लगी है।

----------------------------------------------------

पति (पत्नी से)- हम किसी बात पर सहमत नहीं हो सकते क्या ?

पत्नी (पति से)- हो सकते हैं। इसी बात पर कि हम दोनों किसी बात पर सहमत नहीं हो सकते।

----------------------------------------------------

पत्नी (गुस्से में)- आज तक तुमने अपनी जिंदगी में किया ही क्या हैं?

पति (गर्व से)- मैंने अपना जीवन खुद बनाया है।

पत्नी- लो, और मैं हूं कि अब तक ईश्वर को दोष दे रही थी।

----------------------------------------------------

थप्पड़ मारने पर नाराज पत्नी को पति बोला- आदमी उसे मारता है जिसे वो प्यार करता है।

पत्नी ने पति को दो थप्पड़ मारे और कहा- आप क्या समझते हैं कि मैं आपसे प्यार नही करती।

----------------------------------------------------

पत्नी (पति से): हाय! मेरे तो करम फूट गए, जो तुम्हारे पल्ले बंधी वर्ना मुझे तो एक से बढ़कर एक योग्य वर मिल रहे थे।

पति (दुखी होकर): हां वह सचमुच योग्य थे, जो तुम्हारे फंदे में फंसने से बच गए।

Wednesday, October 15, 2008 10:14:57 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

चमन लाल- डॉक्टर साहब, मैंने चाबी निगल ली।

डॉक्टर- कब?

चमन लाल- सर, करीब तीन महीने पहले।

डॉक्टर- तुम अब तक क्या कर रहे थे?

चमन लाल- में डुप्लीकेट चाबी इस्तेमाल कर रहा था, लेकिन अब वो भी खो गई है।

----------------------------------------------------

परसों रात तुम कहां थी, वकील ने युवती से पूछा।

युवती- अपने पड़ोसी के साथ रेस्तरां में खाना खाने गई थी।

और कल रात? वकील ने दूसरा सवाल पूछा।

एक दूसरे पड़ोसी के साथ।

और आज का तुम्हारा क्या कार्यक्रम है? वकील ने धीरे से पूछा।

ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड दूसरा वकील चिल्लाया, यह सवाल मैंने पहले ही कर लिया है।

----------------------------------------------------
संता (बंता से)- इतने खिलाड़ी क्यों फुटबॉल को लात मार रहे हैं?

बंता (संता से)- गोल करने के लिए।

संता- लेकिन बॉल तो पहले से ही गोल है और कितना गोल करेंगे।

----------------------------------------------------

टीचर (राम से)- तुम मेरी कक्षा में सो नहीं सकते।

राम (टीचर से)- सर, सो तो सकता हूं अगर आप जोर से ना बोलें।

----------------------------------------------------
रमेश (बेटे से)- अगर मेरे नदी में तैरने तक तुम एक ही जगह बैठै रहे, तो मैं वापस आकर तुम्हें 10 रुपये दूंगा।

बेटा (रमेश से)- और अगर आप वापस नहीं आ पाए, तो मैं पैसे मम्मी से ले लूं?

Wednesday, October 15, 2008 10:12:53 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Saturday, October 11, 2008

दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
बल्कि दोस्त ही जिन्दगी बन जाते हैं, दोस्ती में..

जरुरत नहीं पडती, दोस्त की तस्वीर की.
देखो जो आईना तो दोस्त नज़र आते हैं, दोस्ती में..

येह तो बहाना है कि मिल नहीं पाये दोस्तों से आज..
दिल पे हाथ रखते ही एहसास उनके हो जाते हैं, दोस्ती में..

नाम की तो जरूरत हई नहीं पडती इस रिश्ते मे कभी..
पूछे नाम अपना ओर, दोस्तॊं का बताते हैं, दोस्ती में..

कौन केहता है कि दोस्त हो सकते हैं जुदा कभी..
दूर रेह्कर भी दोस्त, बिल्कुल करीब नज़र आते हैं, दोस्ती में..

सिर्फ़ भ्रम हे कि दोस्त होते ह अलग-अलग..
दर्द हो इनको ओर, आंसू उनके आते हैं , दोस्ती में..

माना इश्क है खुदा, प्यार करने वालों के लिये अभी
पर हम तो अपना सिर झुकाते हैं, दोस्ती में..

ओर एक ही दवा है गम की दुनिया में क्युकि..
भूल के सारे गम, दोस्तों के साथ मुस्कुराते

Saturday, October 11, 2008 11:03:59 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

फूलों सी नाजुक चीज है दोस्ती,

सुर्ख गुलाब की महक है दोस्ती,

सदा हँसने हँसाने वाला पल है दोस्ती,

दुखों के सागर में एक कश्ती है दोस्ती,

काँटों के दामन में महकता फूल है दोस्ती,

जिंदगी भर साथ निभाने वाला रिश्ता है दोस्ती,

रिश्तों की नाजुकता समझाती है दोस्ती,

रिश्तों में विश्वास दिलाती है दोस्ती,

तन्हाई में सहारा है दोस्ती,

मझधार में किनारा है दोस्ती,

जिंदगी भर जीवन में महकती है दोस्ती,

किसी-किसी के नसीब में आती है दोस्ती,

हर खुशी हर गम का सहारा है दोस्ती,

हर आँख में बसने वाला नजारा है दोस्ती,

कमी है इस जमीं पर पूजने वालों की वरना इस जमीं पर "भगवान" है दोस्ती

Saturday, October 11, 2008 10:57:49 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक दिन राजू के पापा एक रोबोट लेकर आए। वह रोबोट झूठ पकड़ सकता था और झूठ बोलने वाले को गाल पर खींचकर चांटा मार देता था।
आज राजू स्कूल से घर देर से आया था ...... पापा ने पूछा, ''घर लौटने में देर क्यों हो गई ?''
''आज हमारी एक्स्ट्रा क्लासेस थी'' - राजू ने जवाब दिया।
रोबोट अचानक अपनी जगह से उछला और राजू के गाल पर एक जोरदार चांटा मार दिया।
पापा हंसकर बोले, ''ये रोबोट हर झूठ को पकड़ सकता है। अब सच क्या है यह बताओ... कहां गए थे ?''
''फिल्म देखने'' - राजू ने गाल को सहलाते हुए जवाब दिया।
''कौनसी फिल्म'' - पापा ने कड़ककर पूछा ।
''जय हनुमान''
चटाक!..... अभी राजू की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके गाल पर रोबोट ने एक जोर का चांटा मारा।
''कौनसी फिल्म'' - पापा ने फिर पूछा ।
''कातिल जवानी''
पापा गुस्से में बोले, ''शर्म आनी चाहिए तुम्हें। जब मैं तुम्हारे जितना था तब ऐसी हरकत नहीं किया करता था।''
चटाक!..... रोबोट ने एक चांटा मारा .... इस बार पापा के गाल पर।
यह सुनते ही मम्मी किचन में से आते हुए बोलीं, ''आखिर तुम्हारा ही तो बेटा है न! झूठ तो बोलेगा ही''
अब मम्मी की बारी थी ........ चटाक !

Saturday, October 11, 2008 10:54:03 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

अभी शादी का पहला ही साल था,
ख़ुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,

ख़ुशियाँ कुछ यूँ उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभाल रही थी,

सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना
थोड़ा शर्माते हुए हमे नीद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हुमरे बालों मे फिराना,
मुस्कुराते हुए कहना की डार्लिंग चाय तो पी लो,

जल्दी से रेडी हो जाओ, आप को ऑफीस भी है जाना.
घरवाली भगवान का रूप ले कर आई थी,
दिल ओर दिमाग़ पर पूरी तरह छाई थी,
साँस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
इक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था.
.
.
.
5 साल बाद……..
.
.
.
सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना,
टेबल पैर रख कर ज़ोर से चिल्लाना,

आज ऑफीस जाओ तो मुन्ना को
स्कूल छोड़ते हुए जाना…………..

एक बार फिर वोही आवाज़ आई,
क्या बात है अभी तक छोड़ी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर ख़ुद ही संभाल लेना.

ना जाने घरवाली कैसा रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग़ पे काली घटा छाई थी,
साँस भी लेते है तो उन्ही का ख़याल होता है,
हर समय ज़ेहन मैं एक ही सवाल होता है,
क्या कभी वो दिन लौट के आएँगे, हम एक बार फिर कुवारें नही हो सकते?

Saturday, October 11, 2008 10:52:05 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,

ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,

कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,

उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,

मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,

उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया की बीच मँझदार मे,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,

अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,

यूँ तो 'मित्र' का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए!

Saturday, October 11, 2008 10:48:31 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कुछ रोचक तथ्य...

1. कई बीवियां रखने में एक फायदा है; वे अपने पति से लड़ने की बजाय आपस में ही लड़ती रहती हैं।

2. खूबसूरत औरत आंखों के लिये स्वर्ग है, आत्मा के लिये नरक है, और जेब के लिये दिवाला है।

3. दुनिया में तीन चीजें हैं जिन्हें औरतें नहीं समझतीं - आजादी, बराबरी और भाईचारा।

4. सच्चा प्रेम भूत की तरह है - चर्चा उसकी सब करते हैं, देखा किसी ने नहीं।

5. कायर के एक लिये एक साहसिक कार्य खुला हुआ है और वह है - शादी।

6. दुनिया में दो ही ट्रेजडी हैं : एक आप इच्छित वस्तु को पा न सकें; दूसरी उसे पा जायें।

7. पत्ते अच्छे हों तो आदमी ईमानदारी से खेलना पसंद करता है।

8. अगर आप किसी बार बार आने वाले दुष्ट से पिण्ड छुड़ाना चाहते हैं तो उसे कुछ पैसा उधार दे दीजिये।

9. मां को अपने बेटे को आदमी बनाने में बीस बरस लगते हैं और एक अन्य महिला उसे बीस मिनिट में बेवकूफ बना देती है।

Saturday, October 11, 2008 10:47:42 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

Saturday, October 11, 2008 6:48:51 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं,
मैं.. खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं,
मैं.. दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है.. दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं,
मैं.. जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..
साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं,
मैं.. वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना.. तन्हाई साथ है मेरे,
इतना बताना चाह्ता हूं..
ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..
मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं,
मैं.. बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा अभी..
हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं,
मैं.. एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं,
मैं.. खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता
इस छोटी सी जिन्दगी के,
गिले-शिकवे मिटाना चाहता हूँ,
सबको अपना कह सकूँ,
ऐसा ठिकाना चाहता हूँ,
टूटे तारों को जोड़ कर,
फिर आजमाना चाहता हूँ,
बिछुड़े जनों से स्नेह का,
मंदिर बनाना चाहता हूँ.
हर अन्धेरे घर मे फिर,
दीपक जलाना चाहता हूँ,
खुला आकाश मे हो घर मेरा,
नही आशियाना चाहता हूँ,
जो कुछ दिया खुदा ने,
दूना लौटाना चाहता हूँ,
जब तक रहे ये जिन्दगी,
खुशियाँ लुटाना चाहता हूँ

Saturday, October 11, 2008 12:04:53 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Thursday, October 09, 2008

आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ

चूल्हा नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ

आँखों से पोंचने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमान ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

Thursday, October 09, 2008 5:13:53 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

वो जो शायर था चुप सा रहता था
बहकी-बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूँगी खामोशियों की आवाज़ें!
जमा करता था चाँद के साए
और गीली सी नूर की बूँदें
रूखे-रूखे से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है |

Thursday, October 09, 2008 5:13:04 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

याद है इक दिन

मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे

सिगरेट की डिबिया पर तुमने

एक छोटे से पौधे का एक स्केच बनाया था

आकर देखो

उस पौधे पर फूल आया है !

Thursday, October 09, 2008 5:12:18 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था
हवाओं का रुख़ दिखा रहा था

कुछ और भी हो गया नुमायाँ
मैं अपना लिखा मिटा रहा था

उसी का इमान बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था

वो एक दिन एक अजनबी को
मेरी कहानी सुना रहा था

वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था

Thursday, October 09, 2008 5:11:24 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
गुलज़ार


जन्म: 18 अगस्त 1936

उपनाम गुलज़ार
जन्म स्थान दीना, जिला झेलम (अब पाकिस्तान में)
कुछ प्रमुख
कृतियाँ
पुखराज, एक बूंद चाँद, चौरस रात, रवि पार, कुछ और नज़्में
विविध गुलज़ार का पूरा नाम समपूरन सिंह कालरा है। आप "त्रिवेणी" छंद के सृजक और हिन्दी फ़िल्म उद्योग के जाने-माने गीतकार हैं।

 

यह पन्ना, गुलज़ार को समर्पित है।

सभी से अनुरोध है कि यदी वो लोग अपनी तरफ़ से कुछ यहाँ प्रस्तुत करना चाहते हैं तो,

वो हमे अपनी ई-मेल भेज सकते हैं। रचना हिन्दी में लिखी हो तो बेहतर है।

sbhardwaj@kaimeetechnology.com

 

धन्यवाद:::
वेबमास्टर 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Thursday, October 09, 2008 4:50:16 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं

आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।

शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या

घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के


औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर

पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो

इक पथराई सी मुस्कान लिए

बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।


जब धुआँ देता, लगातार पुजारी

घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर

इक जरा छींक ही दो तुम,

तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

:: गुलज़ार ::

Thursday, October 09, 2008 4:38:40 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, October 05, 2008

अपनी फ़ितरत वो कब बदलता है
साँप जो आस्तीं में पलता है

दिल में अरमान जो मचलता है
शेर बन कर ग़ज़ल में ढलता है

मुझको अपने वजूद का एहसास
इक छ्लावा-सा बन के छलता है

जब जुनूँ हद से गुज़र जाये तो
आगही का चराग़ जलता है

उसको मत रहनुमा समझ लेना
दो क़दम ही जो साथ चलता है

वो है मौजूद मेरी नस—नस में
जैसे सीने में दर्द पलता है

रिन्द ‘गौतम’! उसे नहीं कहते
पी के थोड़ी-सी जो उछलता है.

Sunday, October 05, 2008 10:44:23 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

खोये-खोये-से हो हुआ क्या है?
कुछ बताओ ये माजरा क्या है?

भूल कर ख़ुद को भी नहीं चाहा
ये बताओ मेरी ख़ता क्या है?

जाये परदेस कोई फिर ये कहे
अजनबी क्या है, आशना क्या है

नाम लेते हैं तेरा जीने को
और फ़क़ीरों का आसरा क्या है?

दिल लगाते किसी से तो कहते
बेवफ़ाई है क्या वफ़ा क्या है

आदमीयत के जो पुजारी हैं
वो नहीं जानते ख़ुदा क्या है

पूछ लो प्यार करने वालों से
प्यार के जुर्म की सज़ा क्या है?

ग़म ज़ियादा हैं कम ख़ुशी ‘गौतम’!
और इस बज़्म में धरा क्या है?

Sunday, October 05, 2008 10:41:01 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

ना-तजुर्बाकारी से वाइज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है

वाइज़= धर्मोपदेशक

उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना
मक़सूद है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है

मक़सूद= मनोरथ

वाँ दिल में कि सदमे दो या जी में के सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती हम हैं तो ख़ुदा भी है

अनवार-ए-इलाही= दैवी प्रकाश

सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहे काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है

::: अकबर इलाहाबादी :::

Sunday, October 05, 2008 10:39:18 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
इक ज़रूरत से जाता था बाज़ार
ज़ोफ-ए-पीरी से खम हुई थी कमर
राह बेचारा चलता था रुक कर
चन्द लड़कों को उस पे आई हँसी
क़द पे फबती कमान की सूझी
कहा इक लड़के ने ये उससे कि बोल
तूने कितने में ली कमान ये मोल
पीर मर्द-ए-लतीफ़-ओ-दानिश मन्द
हँस के कहने लगा कि ए फ़रज़न्द
पहुँचोगे मेरी उम्र को जिस आन
मुफ़्त में मिल जाएगी तुम्हें ये कमान

::: अकबर इलाहाबादी :::

Sunday, October 05, 2008 10:36:48 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी
निकलती हैं दुआऎं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर

तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था
मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर

न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे
मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर

हक़ीक़त में मैं एक बुल्बुल हूँ मगर चारे की ख्वाहिश में
बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर

निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनू है
सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर

                             ::: अकबर इलाहाबादी :::

Sunday, October 05, 2008 10:34:57 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कल मैने खुदा से पूछा कि खूबसूरती क्या है?
तो वो बोले


खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है
खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए
खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए
खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे
खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो
खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ
खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ
खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ
खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए
खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ
खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल

Sunday, October 05, 2008 9:03:15 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Wednesday, September 17, 2008

बहते अश्को की ज़ुबान नही होती,
लफ़्ज़ों मे मोहब्बत बयां नही होती,
मिले जो प्यार तो कदर करना,
किस्मत हर कीसी पर मेहरबां नही होती.

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला कर रखना ।

Wednesday, September 17, 2008 8:40:23 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Tuesday, September 16, 2008