Sunday, August 31, 2008

दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
बल्कि दोस्त ही जिन्दगी बन जाते हैं, दोस्ती में..

जरुरत नहीं पडती, दोस्त की तस्वीर की.
देखो जो आईना तो दोस्त नज़र आते हैं, दोस्ती में..

येह तो बहाना है कि मिल नहीं पाये दोस्तों से आज..
दिल पे हाथ रखते ही एहसास उनके हो जाते हैं, दोस्ती में..

नाम की तो जरूरत हई नहीं पडती इस रिश्ते मे कभी..
पूछे नाम अपना ओर, दोस्तॊं का बताते हैं, दोस्ती में..

कौन केहता है कि दोस्त हो सकते हैं जुदा कभी..
दूर रेह्कर भी दोस्त, बिल्कुल करीब नज़र आते हैं, दोस्ती में..

सिर्फ़ भ्रम हे कि दोस्त होते ह अलग-अलग..
दर्द हो इनको ओर, आंसू उनके आते हैं , दोस्ती में..

माना इश्क है खुदा, प्यार करने वालों के लिये "अभी"
पर हम तो अपना सिर झुकाते हैं, दोस्ती में..

ओर एक ही दवा है गम की दुनिया में क्युकि..
भूल के सारे गम, दोस्तों के साथ मुस्कुराते हैं, दोस्ती

दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
बल्कि दोस्त ही जिन्दगी बन जाते हैं, दोस्ती में..

जरुरत नहीं पडती, दोस्त की तस्वीर की.
देखो जो आईना तो

Sunday, August 31, 2008 4:25:03 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 29, 2008

वक़्त रात का था
सब सो गए थे
आँखे मगर मेरी
लगातार सजल थी
ज्यूँ छत का पंखा
लगातार चकरा रहा था
तस्वीर कई तरह की
उभरी ज़हन में और मिट गयी
पलकें झपकी नहीं थी कही देर से
धीमी रौशनी झिलमिलाती रही भीगी आँखों में

पलकें नहीं झपकी यूँ आँखे सजल थी ???
या आँखे सजल थी यूँ पलकें नहीं झपकी ???

कई ख्याल मन को चौंका रहे थे

हाँ यही तो कहा था उसने जाते जाते

हालत और बदतर हो जाएंगे
हालत और बदतर हो जाएंगे

क्यूँ कहा समझ नहीं पा रहा था
धमकी थी या चेता रहा था
बहुत क्रूर मगर उसका कहा था
असर उन बोलों का कैसे कहूं मैं
नींद आँखों से दूर थी कोसो
और चाहत भी नहीं के अब पास आये

पंखे सा लगातार चकरा रहा हूँ
ख्यालों को दीवारों से टकरा रहा हूँ.
ख्यालों को दीवारों से टकरा रहा हूँ.

Friday, August 29, 2008 1:15:38 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

सरे शाम से चल रही थी पुरवाई
जिक्र उसका हुआ आँख भर आई

अहमियत उसकी क्या है बतलायें
वो इक जिस्म जिसकी मैं परछाई

खामोशी को मेरी बुज़दिली न समझो
ब्यान-ए-इश्क में है प्यार की रुसवाई

मिलना उसका अब नामुमकिन है
बारहा दिल को बात ये समझाई

गयी बूंदे कुरेद सूखे ज़ख्मों को
बरखा ये अज़ब रंग लाई||

Friday, August 29, 2008 1:14:20 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

शरबती आँख में फैला है काजल के यूँ
लरजती शाम में श्यामल सा बादल के यूँ

खूबसूरती तमाम खुदा ने लुटा दी यहीं
ओढा है वादी ने धुंध का आँचल के यूँ

तो भी साथ होता है जब वो नहीं होता
दिमाग-ओ-दिल में है मची खलबल के यूँ

कुछ अल्फाज़ ले कर चन्द खुश लम्हों से
है संवारी सजाई मैने ग़ज़ल के यूँ

Friday, August 29, 2008 1:13:26 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

चंद लम्हाते हिज्र का तमाशा देखो
आब-ओ-दाना है यूँ कर उजड़ता देखो

बानगी वस्ल के लम्हों की क्या बतलायें
मिला हो रोते बच्चे को खिलौना देखो

भागती दौड़ती ज़िन्दगी की मसरुफियत में
हुआ है गुम यहीं-कहीं बचपना देखो

वो शख्स इक बूँद की गुजारिश थी जिसे
सागर है मिला फिर भी मचलता देखो

वो 'मारीच' है कभी भी मिल न पाएगा
क्यों बंद आँख से उसे बारहा देखो

ज़ाहिर हो चले राज़ वहशत के सभी
क्यों उस वहशी में तुम रहनुमा देखो

दीवाना है लगे वो कही ‘गौतम’ तो नहीं
देखो गौर से उसे एं दोस्त ज़रा देखो

Friday, August 29, 2008 1:13:03 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

रात पूनम की है हर शख्स आहें भरता है
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़-रोज़ उतरता है

वो उड़ती जुल्फ वो काजल वो गुलाबी सी हया
वो सादगी में भी इक नूर सा निखरता है

बरसते भीगते मौसम पे है नशा तारी
के उसके हुस्न के जलवे से कौन उभरता है

अज़ब फ़साना-e-महफिल है होश गुम हैं सभी
ज़रा ही देर वो बेपर्दा जो गुजरता है

वो दोस्त था निगेबाँ था मेरी वफाओं का
दिल आज भी वहीँ अटका वही दम भरता है

जुस्तजू उसकी है ‘गौतम’, है आरजू-e-विसाल
क्या कहूं कैसे कहूं सोचता दिल डरता है

Friday, August 29, 2008 1:12:28 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
मै पागल हूं
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में मचलती रहती हैं
बेचैन रुह भटकती रही
चैन की इक सांस को दिल की धड़कन मचलती रहती हैं
बारिश भी तो थमती नहीं
दिल की धड़कन गरजने को मचलती रहती हैं
जनाज़ा कब्र का करता रहा इन्तज़ार
ज़िन्दा लाश दिल की धड़कन रुकने को मचलती रहती हैं
Friday, August 29, 2008 1:09:37 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

अब तो कोई एहसास ही बाक़ी ना रहा
दिल का कोई तमन्ना ना रहा
टूट गये है दिल के रिश्ते ऐसे
अब तो जीने की तमन्ना ना रहा..

हालत कुछ एस ही बदल गये
जो अपने थे सब ग़ैर हो गये
क्या जाने क्या हो गया
साथ जिनका था सब दूर हो गये

मंज़िल जो थी ..अब तो सोचने को मजबूर हुए
जाने क्यूं इतने कमज़ोर हुए
एक पल मे राह चलते ,जाने ये क्या हुआ
एक ही दास्तान के दो टुकड़े और हुए.

Friday, August 29, 2008 1:09:10 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
सफ़र तन्हा , रास्ता तन्हा
ज़िंदगी का ये कारवाँ तन्हा


साथी मिले , साथी चले
चल पड़े हम भी आगे तन्हा

साथ उसका होगा ना होगा , उलझाने बहुत
और ख़याल तन्हा

सफ़र तन्हा रास्ता तन्हा
ज़िंदगी का ये कारवाँ तन्हा

रिश्ते छूटे साथ छूटा
निकले है हम इस कदर तन्हा

ढूँढने को अपनी मंज़िल, चल रहा
हर शख्स तन्हा......
Friday, August 29, 2008 1:08:09 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
वो देख ना चाँद को, कितना चमकता हैं माँ.....
नीचे क्यों नहीं आता, क्या वो इतना डरता हैं माँ....

रोज़ रात को सपना आता हैं मुझे,
खुदा भी धरती पर उतरता हैं माँ...
तू जब भी मुँह खोलती हैं,
तब मुझसे वो बात करता हैं माँ....

ये आँखे क्यों भीग गयी तेरी,
क्यों आंसू पलकों पे ठहरता हैं माँ,
उधर देख वो चिडियों का घर,
वो चूजा कितना इतरता हैं माँ...

तू मुझे अकेला तो नहीं छोडेगी?
मेरा वक्त तुझ ही से गुज़रता हैं माँ...
Friday, August 29, 2008 1:03:45 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
बरसों से दीये जलाते हैं
मुद्दतों से अजान होती हैं
वक्त बेवक्त याद करते हैं तुझे
जब भी जिन्दगी परेशान होती हैं..

"खुदा भी राजमर्रा की बातो पर गौर नहीं करता हैं"
Friday, August 29, 2008 1:01:00 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
कभी महसूस करो मुझे..
मेरे साथ बेठो, बाते‍ करो..
ख्याल ज़िन्दा हो उठे‍गे कि..
मैं ख्वाब देता हूँ..

शाम कि दहलीज़ से निकलकर..
रात के सिराहने से गुज़रता हुआ..
तुम्हारी हसीन आंखो का गुलाम..
तुम्हारी पलको पे रहता हुं...

महसूस करो मुझे भी कभी कि..
मैं ख्वाब देता हूँ‍..

यादों की उंगली पकड कर..
पलको की तामीर से फिसल कर...
होंठो पे मुस्कान बनकर..
हर दम तुम्हें खुश रखता हुं..

महसूस करो मुझे भी कभी कि...
मैं ख्वाब देता हूँ....

मैं वही हूँ , जिसे किसी दुआ में मांगा तुमने..
मैं वही हूँ, जिसे खुदा ने तुम्हें बक्शा..
बचपन की नामुराद चाहत का, नतीजा हुं मैं....
बचपन से हर वक्त तुम्हारे साथ रहता हुं..

अब तो महसूस करो मुझे भी कभी कि..
मैं ख्वाब देता हूँ....
Friday, August 29, 2008 1:00:01 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ‘ दीप ‘ को जला कर रखना
Friday, August 29, 2008 12:58:56 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
भभकता सूरज, गर्म हवाए, सूखती धरती..
मरते लोग...सब कुछ तो ठीक था....
हर साल यही तो होता हे..
फिर भी स्कूल से लौटी छुटकी ने
थेला रखकर आँगन मे..
जाने कौनसा गीत गाने लगी..
जोर-जोर से चिल्लाने लगी..
कि मानसून आने वाला हे
भाई मानसून आने वाला हे..

सत्तर पार की संतो काकी..
बैचेन होकर चारपाई से उतरी..
उछलती छुटकी का हाथ दबोचा..
लकडी से डराकर कहने लगी..
"मुई पेट भरने को दाना नहीं..
पानी का भी ठिकाना नहीं
घर की इस बिगडी हालत मे
किसको न्योता दे आई"
कि मानसून आने वाला हे
भाई मानसून आने वाला हे..

इतने मे छुटकी हाथ छुड़ाकर
भागी सरपट दुम दबाकर
गोद मे जाकर अपनी माँ को
हस-हसके समझा ने लगी
फिर दोनों उठकर बीच आँगन मे
हसते-हसते गाने लगी..
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं..

लछमन चाचा घर पर आया
उसको भी सबने समझाया
पुराने छप्पर को नया बनाओ
सूखे होज़ को साफ कराओ
इस बार ये पानी बह न जाए
छुटकी गौर से, बात बताने लगी..
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं ..

सूखी धरती पर हरियाली होगी
गायों कि बात निराली होगी
जब मिलेगा उनको खूब चारा
फिर बदलेगा वक़्त हमारा
देख आसमा, लछमन चाचा
मन ही मन गुनगुनाने लगा
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं..

अब संतो कि समझ में आया
दुआ में उसने हाथ उठाया
घर में फिर खुशहाली लादे
राधा कि फिर गोद भरादे
गीले आँगन में खेलता मुन्ना
सोच-सोच, इतराने लगी
बूढी आँखों से आंसू छलका कर
अब संतो काकी गाने लगी
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं.
Friday, August 29, 2008 12:58:04 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक आरजू दिल में उठी हैं, पल भर में जो आंसू भुला दे
जिसमे रोना-धोना बच्चो सा, मुझको भी वो खेल सीखा दे

रबड़ कि गुडिया दिलावादे, चौराहे वाला पेड़ दिखा दे
मन्नू कान्हा गुड्डू श्यामा, अब्दुल जैसे दोस्त मिला दे

धक् धक् धक् धक् चुल्हा जलता, जिसकी आंच में रोटी सिकती
जिसमे हांडी का गुड-घी हो, वो मोटी वाली रोटी खिला दे

अब्दुल के अब्बा मारे डंडा, राधा की मौसी खेल खिलाये
कालूराम को छेड सके हम, ऐसी कोई जगह बता दे

घड़ी के कांटे चुभते हर दम, इनकी फिसलन को रुकवादे
प्यार के मारे भटके हम सब, सबको अपनी राह दिखा दे

थक के चूर हुआ हूँ मैं अब, नानी माँ की लोरी सूना दे
थपकी दे देकर हाथो से, बचपन वाली नींद सुला दे

Friday, August 29, 2008 12:56:51 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
सदियों से एक पहचान हूँ मैं..
नफ़रत से रहा अनजान हूँ मैं..
अब बूढी हुई आवाज़ मेरी
मेरे बेटो ...... हिन्दुस्तान हूँ मैं...

चुपचाप दुब्बक कर बैठा हूँ
अब अंगारों पे लेटा हूँ ...
तुम प्यार करो तो चैन मिले ...
देखो कितना परेशान हूँ मैं...

मेरे बेटों ...हिन्दुस्तान हूँ मैं...

क्यों जात-पात में उलझ गये...
मजहब को लेकर झुलस गये...
क्यों बूढे बाप को नोचते हो ....
अभी जिंदा एक जहान हूँ मैं....

मेरे बेटो ...हिन्दुस्तान हूँ मैं...

दिल्ली में धड़कता दिल हैं मेरा ...
मेरी सोच हिमालय में घूमती हैं...
पूरब पश्चिम में हाथ मेरे.....
दक्षिण को लहरे चूमती हैं.....

क्या अलग -अलग रह पाओगे ?
कई जिस्मो की एक जान हूँ मैं ...
ये बाप अभी तक जिंदा हैं ....
मेरे बेटों ..... हिन्दुस्तान हूँ मैं..
Friday, August 29, 2008 12:55:13 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 22, 2008
लोग बड़ी हस्ती बनने की
दौड़ में जुट जाते हैं
जो होते हैं अक्ल से लंगड़े
वह दर्शकों की भीड़ में बैठकर
ताली बजाए जाते हैं
अपने गम भुलाने के लिये
खुशियों के मनाने चैराहे पर देते धरना
आपस में झगड़ा कर वहां भी
अपने आंसू बहाये जाते हैं

देखते हैं मस्तराम ‘आवारा’
इतने ऊपर है चांद
पर उस पर लपकने के लिए
नीचे ही कई स्वांग रचाये जाते हैं
भागता आदमी जब थक जाता है
तब भी बैचेन रहता है कि
कहीं रौशनी उससे दूर न रह जाये
इसलिये अंधेरे के भय उसे सताये जाते हैं
अपने चिराग खुद ही जलाने की
आदत डाले रहते तो
क्यों गमों का गहरा समंदर
उनको डुबोये रहता
जहां जिंदगी तूफान झेलने की
ताकत रखती है
वहां मौत के डर बनाये जाते हैं
Friday, August 22, 2008 12:18:27 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

मयखाने में वह हर जाम के साथ
अपने गम को भुला आते हैं
पर उतर जाता है जब नशा
तो फिर गम और ज्यादा सताते हैं
महफिलों में मय बंटती है अमृत की तरह
पीकर लोग बहक जाते हैं
जाम की कुछ बूंदों में ही
भद्र लोगों के नकाब उतर जाते हैं

देखा मैने
दर्द कुछ देर दूर चला जाये पर
मिटा नहीं सकता कभी उसे जाम
आंतों की ऊर्जा जो जिन्दगी में
लड़ने के लिए होती है बेहद जरूरी
उसका हो जाता है काम तमाम
जिस दर्द को हवा हुआ समझते हैं
मय को पीकर
वह दिल में जमा हो जाते हैं
और फिर किसी दिन आते हैं
तूफान की तरह
आदमी की जिन्दगी को साथ ले जाते हैं

Friday, August 22, 2008 12:13:52 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Monday, August 18, 2008

मंजिल मिली, मुराद मिली, मुद्दआ मिला
सब कुछ मुझे मिला जो तेरा नक्श-ए-पा मिला
- सीमाब अकबराबादी

अब क्या बताऊं मैं तेरे मिलने से क्या मिला
इरफान-ए-गम हुआ मुझे दिल का पता मिला
- सीमाब अकबराबादी

बात साकी की न टाली जाएगी
करके तौबा तोड़ डाली जाएगी
- हबीब जलील

गम मुझे, हसरत मुझे, वहशत मुझे, सौदा मुझे
एक दिल देके खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे
- सीमाब अकबराबादी

दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले
हम अपने बुजुर्गों का जमाना नहीं भूले
- सागर आजमी

मैयत न मेरी जा के वीराने में रख देना
पैमानों में दफना के मैखाने में रख देना
- सीमाब अकबराबादी

कांटों से गुजर जाना, शोलों से निकल जाना
फूलों की बस्ती में जाना तो संभल जाना
- सागर आजमी

किस-किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया
गैरों का नाम मेरे लहू से लिखा गया
- शहरयार

मैनोशी के आदाब से आगाह नहीं है तू
जिस तरह कहे साकी-ए-मैखाना पिए जा
- अख्तर शीरानी

मैं नजर से पी रहा हूं, ये समां बदल न जाए
न झुकाओ तुम निगाहें, कही रात ढल न जाए
- अनवर मिर्जापुरी

पहलू से दिल को लेके वो कहते हैं नाज से
क्या आएं घर में आप ही जब मेहरबां न हों
- मौलाना मुहम्मद अली जौहर

सारी दुनिया सो जाती है, मैकश हम उठकर रोते हैं
किस तरह गुजरती हैं रातें, तुम क्या समझो, तुम क्या जानो
- मैकश

Monday, August 18, 2008 8:30:08 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक नवोदित फिल्म अभिनेत्री एक फिल्म निर्माता द्वारा उसके साथ किए गए दुर्व्यवहार की शिकायत लेकर पुलिस थाने पहुंची। उसने रोते-रोते पुलिस इंस्पेक्टर को बताया - अमुक निर्माता बहुत नीच आदमी है। कल रात उसने मुझे अपने घर बुलाया और मेरा शारीरिक शोषण किया।

पुलिस इंस्पेक्टर ने बीच में ही टोका - तो आपने उसी वक्त शोर क्यों नहीं मचाया ?

अभिनेत्री ने सुबकते हुए कहा - उस वक्त मुझे पता नहीं था कि वह इतना नीच आदमी है।

पुलिस इंस्पेक्टर ने आगे पूछा - तो फिर यह आपको कब पता चला ?

- यह तो मुझे तब पता चला जब सुबह उसने बिना कोई कोई साइनिंग एमाउंट दिए मुझे चलता कर दिया .......

Monday, August 18, 2008 8:29:18 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, August 17, 2008

कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों के साथ बहुत कुछ साथ है, कानों में घुलता संगीत, टेबल पर कुछ किताबें रखी हैं, पुखराज, वर्जित बाग की गाथा, कुछ अटके कुछ भटके, इन सभी के साथ शोभा डे का एक मोटा सा अंग्रेजी नॉवेल भी है- सुपर स्टार्स ऑफ इंडिया...........
ये सब मेरे साथ रोज ऑफिस आते हैं..........

उँगलियाँ अब भी चल रही है............

एक सौदा रात का एक कौड़ी चाँद की........

कानों में बज रहा है..........
दिमागी परतों पर करियर, पैसा, उम्र और समय का इम्प्रेशन बन रहा है, उसकी रेखाओं को थोड़ा और गहरा कर, उज्जवल भविष्य के सपनों के रंग भर रही हूँ..............
नज़र कभी-कभी मेज़ पर पड़ी किताबों पर पड़ रही है, जैसे पूछ रही हों उँगलियाँ थकी तो नहीं? पन्ने भी तो पलटने हैं तुम्हें इन्हीं उँगलियों से.....
गुलज़ार साहेब, मुदुला गर्ग, अमृता प्रीतम, और हाँ कुछ दिनों पहले शोभा डे को भी तो बुलवा लिया था............सबको एक उम्मीद की नज़र देकर समेटकर घर ले जाता हूँ.........
मेरी बहन के बच्चे जो थोडे दिनो पहले ही तो रहने आये थे मेरे घर... चॉकलेट का इंतज़ार कर रहे हैं, नीचे मेरी गाड़ी की आवाज़ के साथ ही बच्चों की आवाज़ें आ जाती है.....
किताबों को वादा करता हूँ, आज रात सारा काम निपटा कर अपनी नींद को ज़रूर धोखा दे दूँगा.........
सुबह हो गई है........किताबें जाग जाए इससे पहले उन्हें बेग में भरकर ऑफिस ले आता हूँ, कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों की खट-खट से सबकी नींद खुल जाती है.....
कुछ पल के लिए करियर के सपने से नज़रे चुरा ली तो आँखों में पुखराज चमकने लगा..........
लौ मेरी गोदी में पड़ा, रात की तन्हाई में
अकसर जिस्म जलता है तेरे जिस्म को छूने के लिए
हाथ उठते हैं तेरी लौ को पकड़ने के लिए
साँसें खिंच-खिंचके चटख जाती हैं तागों की तरह
हाँप जाती है बिलखती हुई बाँहों की तलाश
और हर बार यही सोचा है तन्हाई में मैंने
अपनी गोदी से उठाकर यह तेरी गोद में रख दूँ
रुह की आग में ये आग भी शामिल कर दूँ....गुलज़ार
पढ़ लिया...............लगा शायद कल रात किताबों के वादे के साथ एक वादा और भूल गई था..............

Sunday, August 17, 2008 9:21:02 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कल ही देखा कुछ बच्‍चे मिट्टी पर
अपने हाथों का निशान बनाकर
उसमें रेखाएँ बना रहें थे
फिर कही से हवा का झोंका आया
और हाथों पर बनी उन लकीरों को
कहीं-कहीं भर गया तो कहीं से
उसका रूख दूसरी तरफ कर दिया
अचानक ख्‍याल आया काश!!
हमारे हाथों की रेखाएँ सच में
मिट्टी की होती
आँसूओं से भीगती,
सौंधी सी खुशबू देती,
या तो तूफान में बह जाती
या हवा के रूख से बदल जाती
कभी ऐसा होता तो मैं
रोज़ अपनी तकदीर को
तेरे दर तक खींच लाता और
तुझे अपनी रेखाओं से कैद कर लेता!!!

Sunday, August 17, 2008 9:17:15 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 15, 2008

छगन बा दमामी देवव्रत जोशी का काव्य संकलन है जिसकी शीर्षक रचना को आज कबाड़खाना पर जारी कर रहा हूँ.दमामी यानी ढोल और अन्य कई वाद्य बजाने वाली वह प्रजाति जिसका संगीत संस्कार न जाने कितने परिवारों में मंगल का अवगाहन करता है. ये कविता दर असल में रावटी में रहने वाले एक सच्चे पात्र छगन बा का कथा चित्र है.हिन्दी साहित्य में ऐसी लम्बी और कथानकपूर्ण रचनाएं कम हीं पढ़ने में आती हैं ..वर्ण व्यवस्था और छुद्रों की अपमानजन स्थितियों और एक इंसान और कलाकार के रूप में स्पंदित उनके मनोयोगों का दस्तावेज़ है यह कविता.



छगन बा दमामी

ढोल पर अपनी मनपसन्द खाल का खोल चढ़ाकर
लाये छगन बा और गले में टॉंगकर
जायज़ा लेने लगे-धिंग-धिंग, ढनढनाट...
गूँज गयी गॉंव के गोयरे से लेकर
दिशाकाश तक
ढोल की आवाज़...
पास के रनिवास में गूँजी ढोल की ढमक
कि रानियों की आत्माएँ ख़ुश हो नाचने लगीं
कि फूल बनने लगीं चम्पे की कलियॉं ।
ठाकुरजी के मन्दिर की घंटी बजने लगी आपोआप
राजकुँवर और नानी-डोड़ियॉं और मनसबदार
ढोर-ढंगर-गाय-भैंस-सॉंप-बिच्छू
निकल आये बाहर।
आम का बौर और और महकने लगा
मतवाला होकर... कुएँ का पानी
कुएँ के गले तक भर आया।

छगन बा का नया ढोल
आज गॉंव के इस छोर से
उस छोर तक बज रहा...
यूँ कहें कि छगन बा का मर्दाना पौरुष ही
झनझना रहा लगातार।
दरअसल बात ये कि छगन बा ढोल पीटते नहीं,
बजाते थे तमीज़, प्यार और मनुहार के साथ।

तीज-तेवार-शादी-ब्याव में
दमामी छगन बा रुआबदार धोती-कुर्ते में सजे
सबके आगे चलते / कि बीमार, बुज़ुर्ग भी
इन्तज़ार करते कि कब मरें और छगन बा
अर्थी के आगे ज़िंदगी की तान उछारते
ढोल बजाते चलें आगे-आगे।

बड़े सुकून और स्वाभिमान और मस्तीभरे
दिन थे वे छगन बा के।
कि एक दिन पंडिज्जी के घर से न्यौता :
कि छगन दमामी आएँ और बच्चा पैदा होने की
ख़ुशी में घर आकर ढोल बजाएँ।
सुबह-सवेरे छगन बा ने ड्रेस पहनी,
साफ़े पर तुर्रा लगाया / और ठाकुरजी के मन्दिर में
धोक देकर पहुँचे पंडिज्जी के घर।
गॉंव के नाने-टाबर और जवान लोग भी
हुजूम बनाके, हल्ला करते मस्तमगन
चले पीछे-पीछे...
कुछ कानाफूसियॉं कि "आज तो मज़ा आ जाएगा
कि छगन बा पंडिज्जी के घर-आँगने
ऐसा बजाएँगे ढोल कि राजा की
बन्दूकों की आवाज़ दुबक जाएगी...'

पंडिज्जी के ओटले पर धोक देकर
छगन बा ने शुरू किया अपना चमत्कार
कि कुँवरानियों से लेकर गॉंव की बूढ़ी ठकरानियों तक
नीम-बबूल से लेकर बूढ़े बरगद-पीपल तक
सब एक नशे में झूमने लगे।

नवजात शिशु ढोल सुनकर भरने लगा किलकारियॉं
और बहू-मॉं के थन से उमड़ी
दूध की धार-नदी के वेग से।

पास खड़े गृहस्थ सन्त बाप्पा और
उनकी मुँहबोली बेटी मनु जीजी के साथ
मैं, उनका पुत्र देवव्रत, महसूस करूँ इस बखत,
इस घड़ी, मेरा भी नया जन्म हो रहा...
लगी ऐसी झड़ी ढोल के बोल की, कि गद्गद
हो गये गॉंव के बामण-बनिए-कुम्हार
तेली-चमार, जात और पद के प्रपंचों से मुक्त
एक दूसरे के और पास, और पास आ गये।

श्रोताओं, यह घटना साठेक बरस पुरानी
कि जब ढोल के साथ एकमेक हो गये थे
छगन बा दमामी।
और ये क्या कि लोगों ने देखा अचरच से
कि वे धड़ाम से गिरे ओटले पर!
गले में टॅंगा ढोल लुढ़कता आया पगडंडी पर।
सब चुप और हैरान-
जैसे समूचे गॉंव को सूँघ लिया सॉंप ने।

तभी गरजे पंडिज्जी-""ये क्या तमाशा?
हुजूम इकट्ठा करके नाटक करता है
बेहोशी का। झटपट उठ और बजा ढोल
कि मुहूर्त निकला जा रहा कम्बख़्त!''
पंडिज्जी की गर्जना से मूर्च्छा टूटी छगन बा की
बोल सुने कठोर कटार-से, छाती छेदनेवाले

फटाफट ढोल को गले में टॉंग
वे मुड़े घर की ओर हुंकारते हुए-
""गुलाम नहीं हूँ तुम्हारा
कि छोरे के जनम पर ढोल बजाने आया
मैं बजाता हूँ अपनी मर्जी से
और ढोल बजता मेरी मर्जी से।
पूछ लो यकीन न हो तो-
अपने भाटे के भेरुजी से, घोड़ाकुंड की मस्तानी,
लहराती नदी से पूछ लो,
पूछ लो मन्दिर में बैठे ठाकुर जी से।
ढोल पेले मुझमें बजता है-मेरी रग-रग में
नाड़ी-नाड़ी में डोलता... और मजबूर कर देता मुझे
कि मैं उसे बजाऊँ। ... आज भी जब
मैं और ढोल बज रहे थे साथ-साथ और
पूरा गॉंव बज रहा था सीने में / और जब
ख़ुशी से नहाया मैं बेसुध गिर पड़ा ओटले पर
तो तुम कहते तमाशा!!''

""उठ और बजा ढोल ! हेकड़ी छोड़'',
गरजे पंडिज्जी।
""तो सुनो पंडिज्जी, बाबजी और गॉंव के सारे साबजी!
आज से नहीं बजाऊँगा ढोल-किसी के
जनम पर / किसी की मौत पर / किसी शादी-ब्याव में
तीज-तेवार पर नजर नी आवेगा छगन -
गले में ढोल बॉंधे।
पंडिज्जी, तुमने मुझे बिकाऊ ढोली और मेरे ढोल को
मरे चमड़े की खोल समझा, बस!
गुलाम नहीं मैं / और मेरा ढोल किसी के।
इसे आज, अभी टॉंगता हूँ खूँटी पे''
फिर गरजे छगन बा- ""मेरा कोई पूत,
पोता, आनेवाली पीढ़ियॉं हाथ नहीं लगावेगी इसको''

आज तो छगन बा तमतमाए हुए
साक्षात् भेरुजी लग रहे थे
पूरे गॉंव को।... और तब
एक जानखाऊ सन्नाटा पसर गया था सब तरफ़

छगन बा का प्रण सुन, टुकुर-टुकुर
ताक रहे थे लोग।
सिर झुकाये खड़े थे पंडिज्जी
रुक गयी थी नदी की धार
पहाड़ों ने सिर झुका लिये थे
पेड़ खड़े थे चुपचाप
साक्षी थी निस्तब्ध पृथ्वी और समूचा आकाश।
नवजात शिशु किलकारी भूल, रोने लगा था
और नद्दी की धार की ऱफ़्तार से उमगता
नयी मॉं के थन का धूध जम गया था औचक।
अन्धड़ और आँधियॉं थम गयी थीं
सूरज सिमट-सकुचाकर बरफ़ का गोला बन गया था।

श्रोताओं, यह एक दलित कलाकार की आत्मा
का रोष था / धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ा तीर
कठोर प्रतिज्ञा का / छूट गया था,
कभी वापस न आने के लिए।
- एक युद्धरत महाभारत को स्तब्ध और
सुन्न करता हुआ... अदृश्य कृष्ण और
भीष्म और विदुर सहित कुन्ती और
पांचाली ने महसूस किया - प्रतिज्ञा हो तो ऐसी!

और उस दिन से छगन बा दमामी
रोटी कमाने सिर्फ़ ढोलक बजाते
कथा-सत्संग में। एकान्त में कभी
देखते खूँटी पर टॅंगे ढोल को
देखते पथराई आँखों... और ढोल देखता
बोलता उनसे बिना बजे।
(दोनों के हाहाकार इतिहास में दर्ज़
नहीं... बची यह आपके कवि की आँखों
देखी काव्यकथा कि किंवदन्तियॉं सच से
ज़्यादा विश्वसनीय होती हैं।)

श्रोताओं, छगन बा छोटे-से आदमी,
लेकिन सिर से पैर, दिल से दिमाग़ तक
सिर्फ़ कलाकार कौल के पक्के।
हेकड़बाज़, तीखे तेवर वाले, हॉं, वे
अपने पूर्वज हरिदास और कुम्भन के खरे वंशज!

आज तुम्हारी बहुत याद आयी छगन बा
बरसों बाद जब मेरे घर-आँगने
पोती जनमी / तुम्हारी ढोल पर बजती
पनिहारिन की धुन सुनी मैंने उसकी किलकारी में
और फिर दिखे तुम - अतीत की आँखों में
साफ़े पर तुर्रा लगाए -
पाखंडी पंडितों और
ध्वजाधारियों को धता बताते,
उनकी औक़ात जताते।

Friday, August 15, 2008 3:38:17 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 08, 2008
मुझे किसी की तालाश है

मुझे जिन्दगी की भी तालाश है

मुझे किसी चीज़ की तालाश है

मुझे सचे दोस्त की तालाश है

मुझे सची दोस्ती की तालाश है

मुझे सचे प्यार की तालाश है

मुझे सचे यार की तालाश है

मुझे सचे लफ्जों की तालाश है

मुझे सचे नाम की तालाश है

मुझे सची ख़ुशी की तालाश है

मुझे सचे आँसुओं की तालाश है

मुझे सची खुशबु की तालाश है

मुझे सचे दर्द की तालाश है

मुझे दिल में बसने वाले की तालाश है

मुझे एक पल की तालाश है

मुझे गुमनाम की तालाश है

मुझे खुदा की तालाश है

मुझे सचे रिश्तो की तालाश है

मुझे सचे ख्वाब की तालाश है

मुझे सांसो की तालाश है

मुझे मंजिल की तालाश है

मुझे सचे जीवन साथी की तालाश है
Friday, August 08, 2008 3:57:54 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 01, 2008

मैने पीना कब सीखा था?
मैने जीना कब सीखा था?
एक बोतल जो टूट गयी,
तो महफ़िल सारी रूठ गयी॥

ये दुनिया एक महफ़िल है
और हम इसके मेहमाँ हैं,
हैं कुछ साक़ी और कुछ आशिक़
उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं॥

आज अगर कुछ शब्द बहे,
तो आखिर दिल से कौन कहे,
प्यार वफ़ा कसमें और वादे
अब इनकी पीड़ा कौन सहे?

पीड़ा को इतिहास बता कर
पीना मैने अब सीखा है।
शायद लोग और कुछ कह दें
पर जीना मैने अब सीखा है॥

Friday, August 01, 2008 11:43:55 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा

कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा

अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा

जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा

Friday, August 01, 2008 11:36:32 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Wednesday, July 30, 2008

नीरस सा यह माहौल, खिल जाए अभी
मुस्कराहट हर तरफ़ जाए बिखर
जगमगाये रौशनी हर कोने में
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

छोटी छोटी खुशियों के वो पल
ना जाने खो गए है किधर
मलाल यह दिल से निकल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

यह नीरस काम की बातें,
दुनियादारी की अगर और मगर
बला हर एक ऐसी टल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

कहने को तो बहुत से है हमदर्द मेरे
सुन के जिनकी बातें गम भी जाए सिहर
हमदर्द सारे ऐसे मुझसे जल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

Wednesday, July 30, 2008 10:42:47 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

फ़िज़ा में हर तरफ़ धुंध हि धुंध है
कल्पना का हर झरोखा मेरे अन्दर बंद है
बरसती ओस में भीगी यह फ़िज़ा थर्राये
सोच मेरी लफ़्ज़ो में क्युँ ना बदल पाये
यह नदीयां यह झरने सभी हो गये गुमसुम
मेरी तन्हाईयों में जैसे ये सभी हो गये है गुम
वादीयों में गुँजता हर एक गीत मधम है
अब तो खुश रहने कि वजह भी कम है
वक्त तो कहता है कि ये बसन्त का मौसम है
फिर मेरे अन्दर क्युँ सर्द वीरानीयाँ कायम है

Wednesday, July 3