Sunday, August 17, 2008

कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों के साथ बहुत कुछ साथ है, कानों में घुलता संगीत, टेबल पर कुछ किताबें रखी हैं, पुखराज, वर्जित बाग की गाथा, कुछ अटके कुछ भटके, इन सभी के साथ शोभा डे का एक मोटा सा अंग्रेजी नॉवेल भी है- सुपर स्टार्स ऑफ इंडिया...........
ये सब मेरे साथ रोज ऑफिस आते हैं..........

उँगलियाँ अब भी चल रही है............

एक सौदा रात का एक कौड़ी चाँद की........

कानों में बज रहा है..........
दिमागी परतों पर करियर, पैसा, उम्र और समय का इम्प्रेशन बन रहा है, उसकी रेखाओं को थोड़ा और गहरा कर, उज्जवल भविष्य के सपनों के रंग भर रही हूँ..............
नज़र कभी-कभी मेज़ पर पड़ी किताबों पर पड़ रही है, जैसे पूछ रही हों उँगलियाँ थकी तो नहीं? पन्ने भी तो पलटने हैं तुम्हें इन्हीं उँगलियों से.....
गुलज़ार साहेब, मुदुला गर्ग, अमृता प्रीतम, और हाँ कुछ दिनों पहले शोभा डे को भी तो बुलवा लिया था............सबको एक उम्मीद की नज़र देकर समेटकर घर ले जाता हूँ.........
मेरी बहन के बच्चे जो थोडे दिनो पहले ही तो रहने आये थे मेरे घर... चॉकलेट का इंतज़ार कर रहे हैं, नीचे मेरी गाड़ी की आवाज़ के साथ ही बच्चों की आवाज़ें आ जाती है.....
किताबों को वादा करता हूँ, आज रात सारा काम निपटा कर अपनी नींद को ज़रूर धोखा दे दूँगा.........
सुबह हो गई है........किताबें जाग जाए इससे पहले उन्हें बेग में भरकर ऑफिस ले आता हूँ, कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों की खट-खट से सबकी नींद खुल जाती है.....
कुछ पल के लिए करियर के सपने से नज़रे चुरा ली तो आँखों में पुखराज चमकने लगा..........
लौ मेरी गोदी में पड़ा, रात की तन्हाई में
अकसर जिस्म जलता है तेरे जिस्म को छूने के लिए
हाथ उठते हैं तेरी लौ को पकड़ने के लिए
साँसें खिंच-खिंचके चटख जाती हैं तागों की तरह
हाँप जाती है बिलखती हुई बाँहों की तलाश
और हर बार यही सोचा है तन्हाई में मैंने
अपनी गोदी से उठाकर यह तेरी गोद में रख दूँ
रुह की आग में ये आग भी शामिल कर दूँ....गुलज़ार
पढ़ लिया...............लगा शायद कल रात किताबों के वादे के साथ एक वादा और भूल गई था..............

Sunday, August 17, 2008 9:21:02 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कल ही देखा कुछ बच्‍चे मिट्टी पर
अपने हाथों का निशान बनाकर
उसमें रेखाएँ बना रहें थे
फिर कही से हवा का झोंका आया
और हाथों पर बनी उन लकीरों को
कहीं-कहीं भर गया तो कहीं से
उसका रूख दूसरी तरफ कर दिया
अचानक ख्‍याल आया काश!!
हमारे हाथों की रेखाएँ सच में
मिट्टी की होती
आँसूओं से भीगती,
सौंधी सी खुशबू देती,
या तो तूफान में बह जाती
या हवा के रूख से बदल जाती
कभी ऐसा होता तो मैं
रोज़ अपनी तकदीर को
तेरे दर तक खींच लाता और
तुझे अपनी रेखाओं से कैद कर लेता!!!

Sunday, August 17, 2008 9:17:15 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 15, 2008

छगन बा दमामी देवव्रत जोशी का काव्य संकलन है जिसकी शीर्षक रचना को आज कबाड़खाना पर जारी कर रहा हूँ.दमामी यानी ढोल और अन्य कई वाद्य बजाने वाली वह प्रजाति जिसका संगीत संस्कार न जाने कितने परिवारों में मंगल का अवगाहन करता है. ये कविता दर असल में रावटी में रहने वाले एक सच्चे पात्र छगन बा का कथा चित्र है.हिन्दी साहित्य में ऐसी लम्बी और कथानकपूर्ण रचनाएं कम हीं पढ़ने में आती हैं ..वर्ण व्यवस्था और छुद्रों की अपमानजन स्थितियों और एक इंसान और कलाकार के रूप में स्पंदित उनके मनोयोगों का दस्तावेज़ है यह कविता.



छगन बा दमामी

ढोल पर अपनी मनपसन्द खाल का खोल चढ़ाकर
लाये छगन बा और गले में टॉंगकर
जायज़ा लेने लगे-धिंग-धिंग, ढनढनाट...
गूँज गयी गॉंव के गोयरे से लेकर
दिशाकाश तक
ढोल की आवाज़...
पास के रनिवास में गूँजी ढोल की ढमक
कि रानियों की आत्माएँ ख़ुश हो नाचने लगीं
कि फूल बनने लगीं चम्पे की कलियॉं ।
ठाकुरजी के मन्दिर की घंटी बजने लगी आपोआप
राजकुँवर और नानी-डोड़ियॉं और मनसबदार
ढोर-ढंगर-गाय-भैंस-सॉंप-बिच्छू
निकल आये बाहर।
आम का बौर और और महकने लगा
मतवाला होकर... कुएँ का पानी
कुएँ के गले तक भर आया।

छगन बा का नया ढोल
आज गॉंव के इस छोर से
उस छोर तक बज रहा...
यूँ कहें कि छगन बा का मर्दाना पौरुष ही
झनझना रहा लगातार।
दरअसल बात ये कि छगन बा ढोल पीटते नहीं,
बजाते थे तमीज़, प्यार और मनुहार के साथ।

तीज-तेवार-शादी-ब्याव में
दमामी छगन बा रुआबदार धोती-कुर्ते में सजे
सबके आगे चलते / कि बीमार, बुज़ुर्ग भी
इन्तज़ार करते कि कब मरें और छगन बा
अर्थी के आगे ज़िंदगी की तान उछारते
ढोल बजाते चलें आगे-आगे।

बड़े सुकून और स्वाभिमान और मस्तीभरे
दिन थे वे छगन बा के।
कि एक दिन पंडिज्जी के घर से न्यौता :
कि छगन दमामी आएँ और बच्चा पैदा होने की
ख़ुशी में घर आकर ढोल बजाएँ।
सुबह-सवेरे छगन बा ने ड्रेस पहनी,
साफ़े पर तुर्रा लगाया / और ठाकुरजी के मन्दिर में
धोक देकर पहुँचे पंडिज्जी के घर।
गॉंव के नाने-टाबर और जवान लोग भी
हुजूम बनाके, हल्ला करते मस्तमगन
चले पीछे-पीछे...
कुछ कानाफूसियॉं कि "आज तो मज़ा आ जाएगा
कि छगन बा पंडिज्जी के घर-आँगने
ऐसा बजाएँगे ढोल कि राजा की
बन्दूकों की आवाज़ दुबक जाएगी...'

पंडिज्जी के ओटले पर धोक देकर
छगन बा ने शुरू किया अपना चमत्कार
कि कुँवरानियों से लेकर गॉंव की बूढ़ी ठकरानियों तक
नीम-बबूल से लेकर बूढ़े बरगद-पीपल तक
सब एक नशे में झूमने लगे।

नवजात शिशु ढोल सुनकर भरने लगा किलकारियॉं
और बहू-मॉं के थन से उमड़ी
दूध की धार-नदी के वेग से।

पास खड़े गृहस्थ सन्त बाप्पा और
उनकी मुँहबोली बेटी मनु जीजी के साथ
मैं, उनका पुत्र देवव्रत, महसूस करूँ इस बखत,
इस घड़ी, मेरा भी नया जन्म हो रहा...
लगी ऐसी झड़ी ढोल के बोल की, कि गद्गद
हो गये गॉंव के बामण-बनिए-कुम्हार
तेली-चमार, जात और पद के प्रपंचों से मुक्त
एक दूसरे के और पास, और पास आ गये।

श्रोताओं, यह घटना साठेक बरस पुरानी
कि जब ढोल के साथ एकमेक हो गये थे
छगन बा दमामी।
और ये क्या कि लोगों ने देखा अचरच से
कि वे धड़ाम से गिरे ओटले पर!
गले में टॅंगा ढोल लुढ़कता आया पगडंडी पर।
सब चुप और हैरान-
जैसे समूचे गॉंव को सूँघ लिया सॉंप ने।

तभी गरजे पंडिज्जी-""ये क्या तमाशा?
हुजूम इकट्ठा करके नाटक करता है
बेहोशी का। झटपट उठ और बजा ढोल
कि मुहूर्त निकला जा रहा कम्बख़्त!''
पंडिज्जी की गर्जना से मूर्च्छा टूटी छगन बा की
बोल सुने कठोर कटार-से, छाती छेदनेवाले

फटाफट ढोल को गले में टॉंग
वे मुड़े घर की ओर हुंकारते हुए-
""गुलाम नहीं हूँ तुम्हारा
कि छोरे के जनम पर ढोल बजाने आया
मैं बजाता हूँ अपनी मर्जी से
और ढोल बजता मेरी मर्जी से।
पूछ लो यकीन न हो तो-
अपने भाटे के भेरुजी से, घोड़ाकुंड की मस्तानी,
लहराती नदी से पूछ लो,
पूछ लो मन्दिर में बैठे ठाकुर जी से।
ढोल पेले मुझमें बजता है-मेरी रग-रग में
नाड़ी-नाड़ी में डोलता... और मजबूर कर देता मुझे
कि मैं उसे बजाऊँ। ... आज भी जब
मैं और ढोल बज रहे थे साथ-साथ और
पूरा गॉंव बज रहा था सीने में / और जब
ख़ुशी से नहाया मैं बेसुध गिर पड़ा ओटले पर
तो तुम कहते तमाशा!!''

""उठ और बजा ढोल ! हेकड़ी छोड़'',
गरजे पंडिज्जी।
""तो सुनो पंडिज्जी, बाबजी और गॉंव के सारे साबजी!
आज से नहीं बजाऊँगा ढोल-किसी के
जनम पर / किसी की मौत पर / किसी शादी-ब्याव में
तीज-तेवार पर नजर नी आवेगा छगन -
गले में ढोल बॉंधे।
पंडिज्जी, तुमने मुझे बिकाऊ ढोली और मेरे ढोल को
मरे चमड़े की खोल समझा, बस!
गुलाम नहीं मैं / और मेरा ढोल किसी के।
इसे आज, अभी टॉंगता हूँ खूँटी पे''
फिर गरजे छगन बा- ""मेरा कोई पूत,
पोता, आनेवाली पीढ़ियॉं हाथ नहीं लगावेगी इसको''

आज तो छगन बा तमतमाए हुए
साक्षात् भेरुजी लग रहे थे
पूरे गॉंव को।... और तब
एक जानखाऊ सन्नाटा पसर गया था सब तरफ़

छगन बा का प्रण सुन, टुकुर-टुकुर
ताक रहे थे लोग।
सिर झुकाये खड़े थे पंडिज्जी
रुक गयी थी नदी की धार
पहाड़ों ने सिर झुका लिये थे
पेड़ खड़े थे चुपचाप
साक्षी थी निस्तब्ध पृथ्वी और समूचा आकाश।
नवजात शिशु किलकारी भूल, रोने लगा था
और नद्दी की धार की ऱफ़्तार से उमगता
नयी मॉं के थन का धूध जम गया था औचक।
अन्धड़ और आँधियॉं थम गयी थीं
सूरज सिमट-सकुचाकर बरफ़ का गोला बन गया था।

श्रोताओं, यह एक दलित कलाकार की आत्मा
का रोष था / धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ा तीर
कठोर प्रतिज्ञा का / छूट गया था,
कभी वापस न आने के लिए।
- एक युद्धरत महाभारत को स्तब्ध और
सुन्न करता हुआ... अदृश्य कृष्ण और
भीष्म और विदुर सहित कुन्ती और
पांचाली ने महसूस किया - प्रतिज्ञा हो तो ऐसी!

और उस दिन से छगन बा दमामी
रोटी कमाने सिर्फ़ ढोलक बजाते
कथा-सत्संग में। एकान्त में कभी
देखते खूँटी पर टॅंगे ढोल को
देखते पथराई आँखों... और ढोल देखता
बोलता उनसे बिना बजे।
(दोनों के हाहाकार इतिहास में दर्ज़
नहीं... बची यह आपके कवि की आँखों
देखी काव्यकथा कि किंवदन्तियॉं सच से
ज़्यादा विश्वसनीय होती हैं।)

श्रोताओं, छगन बा छोटे-से आदमी,
लेकिन सिर से पैर, दिल से दिमाग़ तक
सिर्फ़ कलाकार कौल के पक्के।
हेकड़बाज़, तीखे तेवर वाले, हॉं, वे
अपने पूर्वज हरिदास और कुम्भन के खरे वंशज!

आज तुम्हारी बहुत याद आयी छगन बा
बरसों बाद जब मेरे घर-आँगने
पोती जनमी / तुम्हारी ढोल पर बजती
पनिहारिन की धुन सुनी मैंने उसकी किलकारी में
और फिर दिखे तुम - अतीत की आँखों में
साफ़े पर तुर्रा लगाए -
पाखंडी पंडितों और
ध्वजाधारियों को धता बताते,
उनकी औक़ात जताते।

Friday, August 15, 2008 3:38:17 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 08, 2008
मुझे किसी की तालाश है

मुझे जिन्दगी की भी तालाश है

मुझे किसी चीज़ की तालाश है

मुझे सचे दोस्त की तालाश है

मुझे सची दोस्ती की तालाश है

मुझे सचे प्यार की तालाश है

मुझे सचे यार की तालाश है

मुझे सचे लफ्जों की तालाश है

मुझे सचे नाम की तालाश है

मुझे सची ख़ुशी की तालाश है

मुझे सचे आँसुओं की तालाश है

मुझे सची खुशबु की तालाश है

मुझे सचे दर्द की तालाश है

मुझे दिल में बसने वाले की तालाश है

मुझे एक पल की तालाश है

मुझे गुमनाम की तालाश है

मुझे खुदा की तालाश है

मुझे सचे रिश्तो की तालाश है

मुझे सचे ख्वाब की तालाश है

मुझे सांसो की तालाश है

मुझे मंजिल की तालाश है

मुझे सचे जीवन साथी की तालाश है
Friday, August 08, 2008 3:57:54 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 01, 2008

मैने पीना कब सीखा था?
मैने जीना कब सीखा था?
एक बोतल जो टूट गयी,
तो महफ़िल सारी रूठ गयी॥

ये दुनिया एक महफ़िल है
और हम इसके मेहमाँ हैं,
हैं कुछ साक़ी और कुछ आशिक़
उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं॥

आज अगर कुछ शब्द बहे,
तो आखिर दिल से कौन कहे,
प्यार वफ़ा कसमें और वादे
अब इनकी पीड़ा कौन सहे?

पीड़ा को इतिहास बता कर
पीना मैने अब सीखा है।
शायद लोग और कुछ कह दें
पर जीना मैने अब सीखा है॥

Friday, August 01, 2008 11:43:55 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा

कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा

अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा

जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा

Friday, August 01, 2008 11:36:32 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Wednesday, July 30, 2008

नीरस सा यह माहौल, खिल जाए अभी
मुस्कराहट हर तरफ़ जाए बिखर
जगमगाये रौशनी हर कोने में
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

छोटी छोटी खुशियों के वो पल
ना जाने खो गए है किधर
मलाल यह दिल से निकल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

यह नीरस काम की बातें,
दुनियादारी की अगर और मगर
बला हर एक ऐसी टल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

कहने को तो बहुत से है हमदर्द मेरे
सुन के जिनकी बातें गम भी जाए सिहर
हमदर्द सारे ऐसे मुझसे जल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

Wednesday, July 30, 2008 10:42:47 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

फ़िज़ा में हर तरफ़ धुंध हि धुंध है
कल्पना का हर झरोखा मेरे अन्दर बंद है
बरसती ओस में भीगी यह फ़िज़ा थर्राये
सोच मेरी लफ़्ज़ो में क्युँ ना बदल पाये
यह नदीयां यह झरने सभी हो गये गुमसुम
मेरी तन्हाईयों में जैसे ये सभी हो गये है गुम
वादीयों में गुँजता हर एक गीत मधम है
अब तो खुश रहने कि वजह भी कम है
वक्त तो कहता है कि ये बसन्त का मौसम है
फिर मेरे अन्दर क्युँ सर्द वीरानीयाँ कायम है

Wednesday, July 30, 2008 10:32:50 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, July 27, 2008

संता और बंता एक होटल में खाना खाने गये। संता ने आर्डर दिया और बैरे ने उन्हें खाना लाकर दिया। जैसे ही बैरे ने बंता को देखा वह आ6चर्य से बोला - अरे बंताजी आप । फिर वह होटल में मौजूद अन्य लोगों से बोला - अरे देखो आज हमारे होटल में बंताजी खाना खाने आये हैं। होटल का मैनेजर भी बंता को देखकर बहुत खुश हुआ और उसने बंता से हाथ मिलाया। -तुम तो काफी मशहूर हो । संता ने खाना खाते खाते बंता के कान में फुसफुसाया। - मैं दुनिया का सबसे प्रसिद्ध आदमी हूं। बंता ने बताया । - नहीं यार । अब इतने भी मत बनो । ये कुछ लोग तुम्हें जानते हैं इसका मतलब यह नहीं कि तुम दुनिया के सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति हो। संता ने कहा । - हां ये सच है। तुम सिर्फ नाम बताओ । ऐसा कौन है जो मुझे नहीं जानता हो। बंता ने जवाब दिया। - अच्छा । मैं दस हजार की शर्त लगाता हूं कि मुख्यमंत्री तुम्हें नहीं जानता होगा । संता ने कहा । - ठीक है चलो । बंता ने कहा और अगले ही दिन वे राजधानी पहुंच गये। वहां पहुंचने पर संता ने देखा कि मुख्यमंत्री ने बंता को देखते ही पहचान लिया और गले लगाया। फिर दो दिन मुख्यमंत्री के घर मेहमाननवाजी करने के बाद वे घर लौट आये। - मैंने कहा था न कि मैं दुनिया का सबसे प्रसिद्ध आदमी हूं। अब तो मानते हो। - नहीं । हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री तुम्हें बिलकुल नहीं जानता होगा । अगर वह जानता हो तो मैं दुगने पैसे दूंगा। अगले ही दिन वे दिल्ली में थे। प्रधानमंत्री बड़ी बेतकल्लुफी से बंता से मिले । बोले - -कहां रहते हो बंता यार । तुम्हें देखे हुये तो जमाना बीत गया। फिर तीन दिनों तक प्रधानमंत्री के साथ गोल्फ खेलकर वे घर लौट आये। संता हैरान था पर हार मानने को तैयार नहीं था। - मैं एक एक लाख रूपये देने को तैयार हूं अगर अमिताभ बच्चन तुम्हें पहचान ले तो। - ठीक है । जैसी तुम्हारी मर्जी । अगले दिन वे मुम्बई में अमिताभ बच्चन के घर पहुंचे। बंता ने संता से बाहर लॉन में खड़े रहने को कहा और खुद अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद संता ने देखा कि अमिताभ बच्चन और बंता बाहों में बाहें डाले बालकनी में आ रहे हैं। बंता ने संता की ओर देखा और हाथ हिलाया। इसके बाद संता बेहोश होकर गिर पड़ा। बंता दौड़कर नीचे आया और पानी के छींटे देकर संता को होश में लाने की कोशिश करने लगा।  - संता, संता तुम्हें क्या हुआ ? उठो। संता ने धीरे से आंखें खोलीं और कहा - बंता तुम सचमुच दुनिया के सबसे प्रसिद्ध आदमी हो। - मैंने तुमसे कहा था न पर तुम ही नहीं मानते थे। खैर ये बताओ कि जब मैं तुम्हें मुख्यमंत्री के घर ले गया तब तुम बेहोश नहीं हुये, प्रधानमंत्री के घर ले गया तब तुम्हें कुछ नहीं हुआ फिर अब ऐसा क्या हुआ कि तुम गिर पड़े। संता ने धीरे से बताया - जब तुम ऊपर अमिताभ बच्चन के साथ बालकनी में खड़े थे तो एक आदमी जो मेरे बगल में खड़ा था उसने मुझसे क्या कहा जानते हो ? क्या कहा ? - बंता ने पूछा उसने कहा - संता ने बताया - वह कौन है जो बंता जी के साथ ऊपर बालकनी में खड़ा है।

Sunday, July 27, 2008 10:38:05 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक औरत अपने पति की कब्र पर पंखा झल रही थी। एक राहगीर उसकी यह पति भक्ति देखकर ठिठक कर रुक गया। उसने पास जाकर कहा - बहन जी, अब तो यह मर गया है । अब इस पर पंखा झलने से क्या फायदा ?

औरत ने ठंडी सांस लेकर कहा - मैं इस कब्र को जल्द सुखाने की कोशिश कर रही हूं क्योंकि हमारे यहां का कायदा है कि जब तक पति की कब्र सूख न जाए, औरत दूसरी शादी नहीं कर सकती .....

Sunday, July 27, 2008 10:31:56 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक फिल्म अभिनेता पत्नी को अपनी फिल्म दिखाने ले गया। पत्नी ने जब देखा कि उसका पति हीरोइन के साथ बड़े जोर-शोर से रोमांस कर रहा है तो उससे रहा नहीं गया। पति से बोली - तुम मुझे तो कभी इस तरह प्यार नहीं करते, इसे क्यों कर रहे हो ?

अभिनेता बोला - इसे प्यार करने के मुझे पचास लाख मिले हैं ........

Sunday, July 27, 2008 10:29:24 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Saturday, July 26, 2008
किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा

कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा

काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा

किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा

देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा

आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,
क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है. .

चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,
तोह चाँद की चाहत किसे होती.

कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,
तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.

कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,
इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,

जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,
न बताकर बेवफाई मत करना.

दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है
अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है

दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,
अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है
Saturday, July 26, 2008 11:33:15 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Monday, July 21, 2008
मुझसे मुंह मोड़ कर तुम को जाते हुए,
मूक दर्शक बना देखता रह गया ,
क्या मिला था तुम्हें दिल मेरा तोड़ कर,
जिंदगी भर यही सोचता रह गया ???

भूलने के लिये तुमको हम ने जतन,
क्या नहीं हैं किये ए जान-ऐ-मन,
उतने ही याद आये हो तुम रात दिन,
अपनी यादों से मैं जूझता रह गया???
 
रास्ता जब बनी रास्ते की गली,
मैं जो गुजरा कभी धडकने बढ़ गयी,
एक खिड़की खुली और तुम्हें देख कर,
मैं जहाँ पर खडा था खडा रह गया???
जिदगी भर यही सोचता रह गया”
Monday, July 21, 2008 12:11:51 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

काँटों की चुभन सी क्यों है तन्हाई
सीने की  दुखन  सी  क्यों   है  तन्हाई,

ये  नजरें  जहाँ  तक  मुझको  ले  जांयें ,
हर  तरफ  बसी  क्यों  है  सूनी  सी   तन्हाई

इस  दिल  की  अगन  पहले  क्या  कम  थी ,
मेरे  साथ  सुलगने  लगती  क्यों  है  तन्हाई

आंसू  जो  छुपाने  लगता  हूँ  सबसे ,
बेबाक  हो  रो देती  क्यों   है  तन्हाई

तुझे  दिल  से  भुलाना  चाहता  हूँ ,
यादों के भंवर मे उलझा देती क्यों है तन्हाई 

एक  पल  चैन  से  सोंना  चाहता  हूँ ,
मेरी  आँखों मे जगने लगती क्यों है तन्हाई 

तन्हाई से दूर नही अब रह सकता,

मेरी सांसों  मे,  इन  आहों मे,
मेरी रातों मे,  हर बातों मे,
मेरी आखों मे, इन ख्वाबों मे,
कुछ अपनों मे, कुछ सपनो मे ,
मुझे अपनी सी लगती क्यों है तन्हाई ????

Monday, July 21, 2008 12:09:37 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, July 20, 2008

जिसके नयनों की नदी में बह जाता हो हर दुख, आँचल की नम भूमि पर फूट आती हों, नन्हीं कोंपलें नए जीवन का संदेश देती हुई, जिसकी बाँहों का आकाश सदा खुला रहता हो अरमानों के पंछियों के लिए, उस नारी की जब भी बात आती है, मैं गौरांवित हो जाता हूँ यह सोचकर कि मैं एक नारी का हमसफ़र हूँ......फिर चाहे बात जीवन की निरंतता की हो, चंचलता की हो या सुंदरता की............

आपने कभी गौर किया है कि जब भी सौंदर्य जैसे शब्द आते हैं, तो नारी के देह को नज़र अंदाज नहीं कर पाता कोई, फिर चाहे अजंता एलोरा की मूरत हो, फिर चाहे गुलज़ार का गीत (तेरे कमर के बल से नदी मुड़ा करती थी, हँसे तो गालों पर भँवर पड़ा करते थे, और वो.....ज़ुल्फों के नीचे गर्दन पर सुबह शाम मिलती रहे)....... यह सब एक पुरुष ही लिख सकता है, नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में..... डोंट माइंड, जब भी कोई नारी सजती-सँवरती है, तो खुद को किसी कवि की कल्पना से कम नहीं समझती, उसका अपना एक स्टाइल होता है.........

हाँ तो मेरा पसंदीदा परिधान...जी हाँ साड़ी, रंग?? जो मुझे खुश आकर्षित कर जाए । प्लेन साड़ियाँ, ह्म्म्म्म्म्म्म, आइ एम लविंग इट...फिर भी फ्लोरल प्रिंट्स यानि खुशनुमा सुबह की शुरुआत, बड़ी बिंदी....हमेशा रॉयल फील होता है....थोड़ा-सी परिपक्वता आ जाती है चेहरे पर, हाँ तब नज़रें चुरा लेती है नारी... यु नो आँखों की किलकारियाँ बाज नहीं आती।
लेकिन पता नहीं क्यों आजकल बालों से झाँकते उम्र के ताने बुरे नहीं लगते, इसलिए छुपाती नहीं नारी , अकसर बाल खुले रखती है वो , हर साल हेअर स्टाइल बदलती है, बड़ी ज्वेलरी, बिड्स और स्टोन हो तो सोने पर सुहागा।

बहुत हो गया नारी के बारे में, अब आइए थोड़ा जनरलाइज़ कर देते हैं स्टाइल को। पसंदीदा परिधान ....महिलाओं के लिए साड़ी, लड़कियाँ....10 में से 9 लड़की आपको सिर्फ जींस और टॉप में नज़र आएँगी। यु नो मोर कम्फर्टेबल..... कौन दुपटा संभालता फिरे?? आजकल कान में लम्बी बालियों का फैशन है, और हाँ, लाँग स्कर्ट को कैसे भूल सकते हैं। उसे देखकर कम से कम युवाओं में आज भी ट्रेडिशनल टच के जीवंत होने की संतुष्टि रहती है।

हमारे जयपुर में कपड़ों के लिए बहुत बड़ा बाजार है, जहाँ देखो वहाँ इंद्रधनुषी रंगो की छटा बिखरी हुई नज़र आती है। चूडियों का बाजार, जहाँ त्योहारों पर तो पैर रखने की जगह नहीं होती। वहाँ से गुज़रो तो लगता है प्रकृति ने सारे रंग सिर्फ नारी के सौंदर्य को बढ़ाने के लिए ही बनाए है, (पुरुष वर्ग इस बात को लेकर मुँह न बिगाड़े, व्यक्ति कितना ही मोडर्न हो जाए, नारी को लेकर उसकी कल्पना आज भी बीसवीं सदी से आगे नहीं बढ़ी, आज भी उसके सपनों की मल्लिका उसे शुद्ध पारंपरिक परिधान में लिपटी, झुकी हुई नज़रों को चंचलता से उठाती हुई, पैर के अँगूठे से ज़मीन को कुरेदती हुई, शर्माती हुई ही नज़र आती होगी, ऐसा मुझे लगता है। आपकी कल्पना मेरी कल्पना से अलग भी हो सकती है!!!)....

Only For Ladies….जानबूझकर यह टाइटल रखा है... पुरुषों की जिज्ञासा को बहुत अच्छे से जानता हूँ.................हाँ तो जो पुरुष यह पढ़ रहे हैं उनके लिए खास टिप्स...टीनएजर्स- लो वेस्ट जींस में, उसके बाद की उम्र वाले जींस, टी-शर्ट और रफ एण्ड टफ लुक में, उसके बाद सफेदी की झनकार वाली ऑफिशियल शर्ट या स्ट्राइप्स वाली शर्ट्स में, पार्टी में नए स्टाइल का कोई भी सूट या डिज़ाइनर शर्ट...............यह आम महिलाओं की पसंद है पुरुष परिधानों में....लेकिन हाँ, टी-शर्ट आप अपनी पर्सनालिटी को सूट करता हुआ ही पहनें........

देखा बात शुरू हुई थी नारी के सौंदर्य से और खत्म हुई पुरुष परिधानों पर .....ऐसा कुछ भी नहीं है जो Only for ladies... या Only for gents ho... दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। सुंदरता शब्द के साथ अगर नारी का ज़िक्र होता है तो सुंदरता को परिभाषित करने के लिए हैं पुरुष, क्योंकि नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में.....

Sunday, July 20, 2008 7:29:38 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

१.
मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने

रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे

२.
सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा(भिक्षापात्र)
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें

सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।

३.
सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर

कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।

४.
शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को

तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?

'५.
ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी

खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!

६.
लोग मेलों में भी गुम हो कर मिले हैं बारहा
दास्तानों के किसी दिलचस्प से इक मोड़ पर

यूँ हमेशा के लिये भी क्या बिछड़ता है कोई?

७.
आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!

चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा

८.
पौ फूटी है और किरणों से काँच बजे हैं
घर जाने का वक्‍़त हुआ है,पाँच बजे हैं

सारी शब घड़ियाल ने चौकीदारी की है!

९.
बे लगाम उड़ती हैं कुछ ख्‍़वाहिशें ऐसे दिल में
‘मेक्सीकन’ फ़िल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे।

थान पर बाँधी नहीं जातीं सभी ख्‍़वाहिशें मुझ से।

१०.
तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे
हवा धकेल के दरवाजा़ आ गई घर में!

कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो!!

११.
कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे

ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

१२.
वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था

फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।

१३.
वह जिस साँस का रिश्ता बंधा हुआ था मेरा
दबा के दाँत तले साँस काट दी उसने

कटी पतंग का मांझा मुहल्ले भर में लुटा!

१४.
कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई साथ आया था,उन्हें ले गया,फिर नहीं लौटे

शेल्फ़ से निकली किताबों की जगह ख़ाली पड़ी है!

१५.
इतनी लम्बी अंगड़ाई ली लड़की ने
शोले जैसे सूरज पर जा हाथ लगा

छाले जैसा चांद पडा़ है उंगली पर!

१६.
बुड़ बुड़ करते लफ्‍़ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको और मसल दो पैर की ऐड़ी से ।

अफ़वाहों को खूँ पीने की आदत है।

१७.
चूड़ी के टुकड़े थे,पैर में चुभते ही खूँ बह निकला
नंगे पाँव खेल रहा था,लड़का अपने आँगन में

बाप ने कल दारू पी के माँ की बाँह मरोड़ी थी!

१८.
चाँद के माथे पर बचपन की चोट के दाग़ नज़र आते हैं
रोड़े, पत्थर और गु़ल्लों से दिन भर खेला करता था

बहुत कहा आवारा उल्काओं की संगत ठीक नहीं!

१९.
कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से

टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को!

२०.
कोने वाली सीट पे अब दो और ही कोई बैठते हैं
पिछले चन्द महीनों से अब वो भी लड़ते रहते हैं

क्लर्क हैं दोनों,लगता है अब शादी करने वाले हैं

२१.
कुछ इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में

अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा!

२२.
कांटे वाली तार पे किसने गीले कपड़े टांगे हैं
ख़ून टपकता रहता है और नाली में बह जाता है

क्यों इस फौ़जी की बेवा हर रोज़ ये वर्दी धोती है।

२३.
आओ ज़बानें बाँट लें अब अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात, ना हमको समझना है।

दो अनपढ़ों कि कितनी मोहब्बत है अदब से

२४.
नाप के वक्‍़त भरा जाता है ,रेत घड़ी में-
इक तरफ़ खा़ली हो जबफिर से उलट देते हैं उसको

उम्र जब ख़त्म हो ,क्या मुझ को वो उल्टा नहीं सकता?

२५.
तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे

ये तुमने होंठों पे अफसाने रख लिये कब से?

Sunday, July 20, 2008 7:22:32 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

ये हिंदुस्तान को क्या हो रेला है भई? इन्डिया से शादीशुदा बालबच्चेदार मित्र चैटिया रहे हैं. शकीरा अपने इंडिया मे आ रेली बाबा! उसका वो गाना देखाना है “हिप्स डोंट लाई!” अर्थात नितंब असत्य नहीं बोलते. हम बोले -

अबे आती है तो आने दे तेरे को क्या?
अबे पता है एक टिकट कित्ते की?
कित्ते की?
३६५० रुपये की!
क्या? चरया गया है क्या साईं?
बंदा ज्यादा बकझक करने के बज़ाए कडी थमा देता है -
देख ले भई!
अबे रुक.
मैं दनाक से केल्कुलेटर खोल के ४३.९३ आजकल के कंवर्जन रेट से भाग दे कर देखता हूं ताकी मामला अपनी डिफ़ाल्ट करंसी मे समझ में आए  -

अबे ८३ डालर!!
हव्व
कौन जाएगा देखने?
जनता जाएगी
देसी जनता?
हव्व!
इत्ता पैसा है उनके कने?
हव्व!
क्या बोल रिया है बे?
सही बोल रिया हूं यार!!

शकीरा मेरी फ़ेवरेट पॉप कलाकार हैं, लेकिन इस भाव में तो मैं उनका कंसर्ट कतई ना देखूं!

*-*-*

कल अंतर्यामिणी बता रही थीं की शहर में ‘लायन किंग’ कंसर्ट हाल में शो करने आएंगे. शायद दफ़्तर वालों की कंसर्ट हाल को दी जाने वाली कार्पोरेट स्पांसरशिप के चलते मिलने वाली मुफ़्त टिकटें पाने का मौका हाथ लगे तो देख आएं.

पत्नी: और अगर टिकटें ना मिलें तो?
स्वामी: हमऊं खरीद के देख लेंगे!
पत्नी: हे हे पता है एक टिकट कितने की है?
स्वामी: कित्ते की?
पत्नी: ८० डालर
स्वामी: रहने दे भई, ये ज़रा महंगी है. हम बिना लायन किंग के ही भले.

भईये अपने इंडिया की महंगाई देख कर तो यहां बैठ के पसीना आ जाता है उससे ज्यादा वहां का उपभोक्तावाद देख कर. मेरे हाई थिंकिंग सिंपल लिविंग वाले इंडिया को अमरीका की हवा लग गई है. लगता है ये नव-भोक्ता चलते दुनिया को पीछे छोड देंगे!

*-*-*

मैं अपने से जरा दूर वाले दफ़्तर में बैठी अमरीकी महिला से पूछता हूं - औसत कंसर्ट का टिकट कितने का होता है? वो बोली “५०-६०.. लेकिन मैं काफ़ी समय से किसी कंसर्ट में नही गई!”

मैं मुस्कुरा देता हूं - मैं भी नहीं गया! लेकिन मेरे भारतीय मित्र शकीरा के कंसर्ट में जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं भारत में - अस्सी डालर का टिकट ले कर!
पागल हो गए हैं क्या? वो पूछती है!
उन्हें प्रत्यक्ष कंफ़र्म करना है की शकीरा के ’हिप्स डोंट लाई’!

इस भाव में?
हां!
सचमुच पागल हो गए हैं - इस प्रकार के कंसर्ट पर यहां वो बच्चे पैसा खर्च करते हैं जो खुद कमाते हैं फ़िर भी माता-पिता के साथ उनके घर में रहते हैं और अपनी कमाई से ऐश करते हैं वहां कौन करेगा ऐसी चीज़ पर पैसा खर्च?
भारत की जनता करेगी!
इतना पैसा है जनता के पास?
पता नहीं!

मुझे समझ नहीं आया हां बोलू या ना! अभी भी पशोपेश में हूँ!

Sunday, July 20, 2008 7:08:36 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

वाह री आलस्यधारी की व्यस्तता! काफ़ी दिन से कुछ लिखा नही - “जरा व्यस्त था!” व्यस्तता फ़ैशन मे है इस लिए नही, कुछ बचे हुए काम निपटा रहा था! बचे हुए काम यानी वो काम नही जो शुरू ही नही किए गए, बल्की वो काम जो शुरू तो किए गए पर कभी सिरे नही पहुंचाए गए. जैसे की फ़्रिज मे इकट्ठी हुई वो बची सब्जियां जिन्हें खत्म करने के चक्कर में एक दिन खाना बनाने कि छुट्टी हो जाती है वैसे ही इन बचे हुए कामों में कई दिन गुज़र जाते हैं! इसे समझ पता उस से पहले ही मैं भी एक रीसर्च करने लग पडा जो अपने आप मे एक और बचा हुआ काम बन गई है! वैसे तो आजकल गूगल पर अपने काम की साईट ढूंढ निकालना भी रीसर्च की श्रेणी में डाला जाता है लेकिन ये मामला अलग है. इस मे गूगल के अलावा याहू को भी झोंका गया था.

दर-असल मामला मीर की गज़ल से शुरु हुआ, मैं बचे काम निपटाता गज़लें सुन रहा था. एक शेर सुना और मैं आलसीयों पर शोध करने मे व्यस्त हो गया. वैसे तो ये शोध भी बहुत आलस में कर रहा हूं लेकिन इस के चलते मैं मेरे सबसे प्रिय मीर की परी रूह, उनकी जान-ए-गज़ल को एक नई रौशनी मे देख पाया हूं.

‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

नीम-बाज़ = अध-खुली

कहना ना होगा की मीर की जान-ए-गज़ल से कमतर कोई किरदार इस शोध से न्याय भी नही कर सकता था. गुणवत्ता के इस अनुपम मिलाप के नतीजे सामने हैं - शुरुआती नतीजा ये है की मीर की महबूबा सोने मे बडी उस्ताद और आलसी थी इसीलिए मीर महान हुए.  उपर वाले शेर में शायर मीर को अपनी आलसी मेहबूबा की उनींदी आँखे भी शराबी की आँखो जैसी मस्त लग रही हैं - उस के आलस्य का प्रभाव देखिये मीर एक झटके में गालिब से आगे निकल गए. भरोसा नही हो रहा? चलो देखो - मीर एक दूसरे शेर मे कहते हैं -

मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
कहां हम, कहां तुम, कहां फिर जवानी

शिकायत करूं हूं तो सोने लगे है
मेरी सर-गुज़िश्त अब हुई है कहानी

अव्वल तो मीर को उनकी परी रूह मिलती नही, मिलती है तो सो जाती है! मीर अपनी स्लीपिंग ब्यूटी पर शायरियां लिख कर अमर हो जाते हैं. महबूबा शायरियां झेलती सोई या सोई और फ़िर शायरियां की गईं ये विवाद का विषय है. फ़िर भी यह तय है की किसी भी स्थिती में, अगर मीर की महबूबा आलसी नही होती तो मीर महान नही होते. वो तो तारीफ़ कर के ही महान हो गए. ऐसी है आलसियों की महिमा!

शोध के पक्ष में आगे मीर की एक गज़ल है पहला शेर बहूत कंफ़्यूजिंग है. मीर क्लासीक शायर थे - ऐसे शेर का मतलब बनाने की जरूरत नही होती थी उस का मतलब होता था जिसे समझने की जरूरत होती थी लेकिन  इस वाली गज़ल मे मामला अलग है

गुल को महबूब में कयास किया
फ़र्क निकला बहुत जो बास किया

दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना
एक आलम से रू-शिनास किया

कयास=विचार, रुउ-शिनास=परिचित, बास किया = गंध सूंधी

मीर की महबूबा खूबसूरत तो थी लेकिन नहाती नही थी. उपर से डीयो भी नही लगाती थी. तभी जब मीर ने “बास” किया तो फ़र्क निकला! और इस की परिणिती में लिखी गई गजल मेरी रिसर्च का आधार स्तंभ बनी. तो उपरोक्त शेर मे मीर कह रहे हैं महबूबा दिखने में फ़ूल जैसी है मगर बास रही है (चूंकी आलस्य के मारे नहाई नही है).

वैसे शेर में बास का मतलब है खुशबू लेकिन इसे क्रिया के समान भिडा कर मीर ने एक और कमाल कर दिया. जैसा की स्पष्ट परिलक्षित है, आलस की और इन्टर्नेट की महिमा के चलते इस शोध के लिए किसी उस्ताद को गाईड नही बनाया गया है. शायरी या किसी भी किस्म की “कला” को समझने के पॉप और माडर्न रास्तों को मानते हुए मैनें शायरी को महसूस करने की कोशिश की और मीर की महानता के राज़ खुलने लगे!

हर जीव का एक स्थायीभाव होता है. जैसे मच्छर का स्थायीभाव है भिनभिनाना, बंदर का उछलना-कूदना - बिला वजह की व्यस्तता ऐसी व्यस्तता जिसका उत्पादकता से कोई सह-संबंध नही है. वहीं दूसरी तरफ़ अजगर/रीछ/साण्ड का स्थायी भाव है पडे/खडे रहना - आलस्य का सौंदर्य वाह! अचानक किसी फ़ितूर या आवश्यकता के दबाव में अल्पकालिक क्रियाशीलता और दोबारा पूर्वावस्था को प्राप्त होना. आलस्य का स्थायीभाव क्रियाशीलता की गति को भी तेज कर देता है - काम निपटे और फ़िर अपन जहां पडें वहां सडें! मीर की नायिका इस दूसरी श्रेणी की जीव है और उसका सौंदर्य कोई मीर जैसा ही समझ सकता है! उसका अलसाया हुआ बासता हुआ सौंदर्य, उस की सही व्याख्या ही मीर को महान बना देती है.

आज तक ये माना जाता था की यही आलसी जीव जब क्रीयाशील होता है तो जैसे एक ही बार में आगे पीछे की सारी कसर निकाल देता है. सारी संचित उर्जा का सदुपयोग हो जाता है! जैसे साण्ड भडक कर किसी का पीछा करने लगे. देखा गया है ऐन मौके पर अचानक साण्ड रुक जाता है पीछा करता है -आक्रमण नहीं. मेरी शोध का नतीजा है की आलस्य क्रियाशीलता के दौरान भी हावी होता है और उसका प्रभाव होता है. कैसे? - आलसी जीव काम करता है लेकिन अधूरा करता है और बाकी काम औरों के करने के लिए छोड देता है. ठीक वैसे ही जैसे मीर की नायिका मिलने तो आती है पर अनुग्रहित किए बिना सो जाती है. अब अनुग्रहित करने का काम कोई और करे - जान-ए-गज़ल है क्या कम है! काम पूरा होने से पहले आलस्य दोबारा जकड लेता है.

दिल-ए-पुर-खूं की इक गुलाबी से
उम्र भर हम रहे शराबी से

दिल दहल जाये है सहर से आह
रात गुज़ारी किस खराबी से

खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आँखों की नीम ख्वाबी से

[नीम_ख्वाबी = उनींदी/अधखुली/नींद से उठी हुई]

स्लीपिंग ब्यूटी अनुग्रहित करने अंखियां खोलती है और लो, आलस्य जकड लेता है फ़िर सो जाती है. रात खराबी मे गुजर रही है, मीर खुन्नस में नही आते वरन आलस्य की महिमा पे न्यौछावर होते उम्र बिता रहे हैं. काश सारे आलसी मीर की परी रूह जैसी किस्मत ले कर आए होते, बिना कुछ किए धरे नाम कमा चुके होते. रह रह के याद दिलाता है कोई - बहुत से बाकी काम बाकी पडे हैं! खैर.. हां शोध जारी रहेगी!

Sunday, July 20, 2008 7:03:11 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

रंग और नूर की इस दुनिया में
इस दिल का करार कहां पायें
इन बदलते हुये हालात में ,
वो प्यार का सिला हम कहां पायें

आप जो ख्वाब की दुनिया ले कर आये थे
आंख खुलते हि वो दुनिया कहीं नही पाये
रास्ते मे जो कांटे बिखरे थे
उसे चाह कर भी हुम छू नही पाये

बेशुमार प्यार भरा था इस दिल मे
आपका गुस्सा फ़िर भी कम नही कर पाये
अब सिर्फ़ इश्क हि उभरा है इन आंखों में
इस दिल को इन अश्कों मे डुबा नही पाये

प्यार के सिवा उलझन हि देखी हमारी हर बात में
लाख कोशिश के बाद भी आप को मना नहीं पाये
प्रेम के फूल चढाये हर वक्त आपके कदमों