वाह री आलस्यधारी की व्यस्तता! काफ़ी दिन से कुछ लिखा नही - “जरा व्यस्त था!” व्यस्तता फ़ैशन मे है इस लिए नही, कुछ बचे हुए काम निपटा रहा था! बचे हुए काम यानी वो काम नही जो शुरू ही नही किए गए, बल्की वो काम जो शुरू तो किए गए पर कभी सिरे नही पहुंचाए गए. जैसे की फ़्रिज मे इकट्ठी हुई वो बची सब्जियां जिन्हें खत्म करने के चक्कर में एक दिन खाना बनाने कि छुट्टी हो जाती है वैसे ही इन बचे हुए कामों में कई दिन गुज़र जाते हैं! इसे समझ पता उस से पहले ही मैं भी एक रीसर्च करने लग पडा जो अपने आप मे एक और बचा हुआ काम बन गई है! वैसे तो आजकल गूगल पर अपने काम की साईट ढूंढ निकालना भी रीसर्च की श्रेणी में डाला जाता है लेकिन ये मामला अलग है. इस मे गूगल के अलावा याहू को भी झोंका गया था.
दर-असल मामला मीर की गज़ल से शुरु हुआ, मैं बचे काम निपटाता गज़लें सुन रहा था. एक शेर सुना और मैं आलसीयों पर शोध करने मे व्यस्त हो गया. वैसे तो ये शोध भी बहुत आलस में कर रहा हूं लेकिन इस के चलते मैं मेरे सबसे प्रिय मीर की परी रूह, उनकी जान-ए-गज़ल को एक नई रौशनी मे देख पाया हूं.
‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
नीम-बाज़ = अध-खुली
कहना ना होगा की मीर की जान-ए-गज़ल से कमतर कोई किरदार इस शोध से न्याय भी नही कर सकता था. गुणवत्ता के इस अनुपम मिलाप के नतीजे सामने हैं - शुरुआती नतीजा ये है की मीर की महबूबा सोने मे बडी उस्ताद और आलसी थी इसीलिए मीर महान हुए. उपर वाले शेर में शायर मीर को अपनी आलसी मेहबूबा की उनींदी आँखे भी शराबी की आँखो जैसी मस्त लग रही हैं - उस के आलस्य का प्रभाव देखिये मीर एक झटके में गालिब से आगे निकल गए. भरोसा नही हो रहा? चलो देखो - मीर एक दूसरे शेर मे कहते हैं -
मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
कहां हम, कहां तुम, कहां फिर जवानी
शिकायत करूं हूं तो सोने लगे है
मेरी सर-गुज़िश्त अब हुई है कहानी
अव्वल तो मीर को उनकी परी रूह मिलती नही, मिलती है तो सो जाती है! मीर अपनी स्लीपिंग ब्यूटी पर शायरियां लिख कर अमर हो जाते हैं. महबूबा शायरियां झेलती सोई या सोई और फ़िर शायरियां की गईं ये विवाद का विषय है. फ़िर भी यह तय है की किसी भी स्थिती में, अगर मीर की महबूबा आलसी नही होती तो मीर महान नही होते. वो तो तारीफ़ कर के ही महान हो गए. ऐसी है आलसियों की महिमा!
शोध के पक्ष में आगे मीर की एक गज़ल है पहला शेर बहूत कंफ़्यूजिंग है. मीर क्लासीक शायर थे - ऐसे शेर का मतलब बनाने की जरूरत नही होती थी उस का मतलब होता था जिसे समझने की जरूरत होती थी लेकिन इस वाली गज़ल मे मामला अलग है
गुल को महबूब में कयास किया
फ़र्क निकला बहुत जो बास किया
दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना
एक आलम से रू-शिनास किया
कयास=विचार, रुउ-शिनास=परिचित, बास किया = गंध सूंधी
मीर की महबूबा खूबसूरत तो थी लेकिन नहाती नही थी. उपर से डीयो भी नही लगाती थी. तभी जब मीर ने “बास” किया तो फ़र्क निकला! और इस की परिणिती में लिखी गई गजल मेरी रिसर्च का आधार स्तंभ बनी. तो उपरोक्त शेर मे मीर कह रहे हैं महबूबा दिखने में फ़ूल जैसी है मगर बास रही है (चूंकी आलस्य के मारे नहाई नही है).
वैसे शेर में बास का मतलब है खुशबू लेकिन इसे क्रिया के समान भिडा कर मीर ने एक और कमाल कर दिया. जैसा की स्पष्ट परिलक्षित है, आलस की और इन्टर्नेट की महिमा के चलते इस शोध के लिए किसी उस्ताद को गाईड नही बनाया गया है. शायरी या किसी भी किस्म की “कला” को समझने के पॉप और माडर्न रास्तों को मानते हुए मैनें शायरी को महसूस करने की कोशिश की और मीर की महानता के राज़ खुलने लगे!
हर जीव का एक स्थायीभाव होता है. जैसे मच्छर का स्थायीभाव है भिनभिनाना, बंदर का उछलना-कूदना - बिला वजह की व्यस्तता ऐसी व्यस्तता जिसका उत्पादकता से कोई सह-संबंध नही है. वहीं दूसरी तरफ़ अजगर/रीछ/साण्ड का स्थायी भाव है पडे/खडे रहना - आलस्य का सौंदर्य वाह! अचानक किसी फ़ितूर या आवश्यकता के दबाव में अल्पकालिक क्रियाशीलता और दोबारा पूर्वावस्था को प्राप्त होना. आलस्य का स्थायीभाव क्रियाशीलता की गति को भी तेज कर देता है - काम निपटे और फ़िर अपन जहां पडें वहां सडें! मीर की नायिका इस दूसरी श्रेणी की जीव है और उसका सौंदर्य कोई मीर जैसा ही समझ सकता है! उसका अलसाया हुआ बासता हुआ सौंदर्य, उस की सही व्याख्या ही मीर को महान बना देती है.
आज तक ये माना जाता था की यही आलसी जीव जब क्रीयाशील होता है तो जैसे एक ही बार में आगे पीछे की सारी कसर निकाल देता है. सारी संचित उर्जा का सदुपयोग हो जाता है! जैसे साण्ड भडक कर किसी का पीछा करने लगे. देखा गया है ऐन मौके पर अचानक साण्ड रुक जाता है पीछा करता है -आक्रमण नहीं. मेरी शोध का नतीजा है की आलस्य क्रियाशीलता के दौरान भी हावी होता है और उसका प्रभाव होता है. कैसे? - आलसी जीव काम करता है लेकिन अधूरा करता है और बाकी काम औरों के करने के लिए छोड देता है. ठीक वैसे ही जैसे मीर की नायिका मिलने तो आती है पर अनुग्रहित किए बिना सो जाती है. अब अनुग्रहित करने का काम कोई और करे - जान-ए-गज़ल है क्या कम है! काम पूरा होने से पहले आलस्य दोबारा जकड लेता है.
दिल-ए-पुर-खूं की इक गुलाबी से
उम्र भर हम रहे शराबी से
दिल दहल जाये है सहर से आह
रात गुज़ारी किस खराबी से
खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आँखों की नीम ख्वाबी से
[नीम_ख्वाबी = उनींदी/अधखुली/नींद से उठी हुई]
स्लीपिंग ब्यूटी अनुग्रहित करने अंखियां खोलती है और लो, आलस्य जकड लेता है फ़िर सो जाती है. रात खराबी मे गुजर रही है, मीर खुन्नस में नही आते वरन आलस्य की महिमा पे न्यौछावर होते उम्र बिता रहे हैं. काश सारे आलसी मीर की परी रूह जैसी किस्मत ले कर आए होते, बिना कुछ किए धरे नाम कमा चुके होते. रह रह के याद दिलाता है कोई - बहुत से बाकी काम बाकी पडे हैं! खैर.. हां शोध जारी रहेगी!