Friday, August 08, 2008
मुझे किसी की तालाश है

मुझे जिन्दगी की भी तालाश है

मुझे किसी चीज़ की तालाश है

मुझे सचे दोस्त की तालाश है

मुझे सची दोस्ती की तालाश है

मुझे सचे प्यार की तालाश है

मुझे सचे यार की तालाश है

मुझे सचे लफ्जों की तालाश है

मुझे सचे नाम की तालाश है

मुझे सची ख़ुशी की तालाश है

मुझे सचे आँसुओं की तालाश है

मुझे सची खुशबु की तालाश है

मुझे सचे दर्द की तालाश है

मुझे दिल में बसने वाले की तालाश है

मुझे एक पल की तालाश है

मुझे गुमनाम की तालाश है

मुझे खुदा की तालाश है

मुझे सचे रिश्तो की तालाश है

मुझे सचे ख्वाब की तालाश है

मुझे सांसो की तालाश है

मुझे मंजिल की तालाश है

मुझे सचे जीवन साथी की तालाश है
Friday, August 08, 2008 3:57:54 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 01, 2008

मैने पीना कब सीखा था?
मैने जीना कब सीखा था?
एक बोतल जो टूट गयी,
तो महफ़िल सारी रूठ गयी॥

ये दुनिया एक महफ़िल है
और हम इसके मेहमाँ हैं,
हैं कुछ साक़ी और कुछ आशिक़
उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं॥

आज अगर कुछ शब्द बहे,
तो आखिर दिल से कौन कहे,
प्यार वफ़ा कसमें और वादे
अब इनकी पीड़ा कौन सहे?

पीड़ा को इतिहास बता कर
पीना मैने अब सीखा है।
शायद लोग और कुछ कह दें
पर जीना मैने अब सीखा है॥

Friday, August 01, 2008 11:43:55 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा

कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा

अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा

जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा

Friday, August 01, 2008 11:36:32 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Wednesday, July 30, 2008

नीरस सा यह माहौल, खिल जाए अभी
मुस्कराहट हर तरफ़ जाए बिखर
जगमगाये रौशनी हर कोने में
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

छोटी छोटी खुशियों के वो पल
ना जाने खो गए है किधर
मलाल यह दिल से निकल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

यह नीरस काम की बातें,
दुनियादारी की अगर और मगर
बला हर एक ऐसी टल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

कहने को तो बहुत से है हमदर्द मेरे
सुन के जिनकी बातें गम भी जाए सिहर
हमदर्द सारे ऐसे मुझसे जल जाए
एक नज़र तुम जो देख लो इधर

Wednesday, July 30, 2008 10:42:47 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

फ़िज़ा में हर तरफ़ धुंध हि धुंध है
कल्पना का हर झरोखा मेरे अन्दर बंद है
बरसती ओस में भीगी यह फ़िज़ा थर्राये
सोच मेरी लफ़्ज़ो में क्युँ ना बदल पाये
यह नदीयां यह झरने सभी हो गये गुमसुम
मेरी तन्हाईयों में जैसे ये सभी हो गये है गुम
वादीयों में गुँजता हर एक गीत मधम है
अब तो खुश रहने कि वजह भी कम है
वक्त तो कहता है कि ये बसन्त का मौसम है
फिर मेरे अन्दर क्युँ सर्द वीरानीयाँ कायम है

Wednesday, July 30, 2008 10:32:50 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, July 27, 2008

संता और बंता एक होटल में खाना खाने गये। संता ने आर्डर दिया और बैरे ने उन्हें खाना लाकर दिया। जैसे ही बैरे ने बंता को देखा वह आ6चर्य से बोला - अरे बंताजी आप । फिर वह होटल में मौजूद अन्य लोगों से बोला - अरे देखो आज हमारे होटल में बंताजी खाना खाने आये हैं। होटल का मैनेजर भी बंता को देखकर बहुत खुश हुआ और उसने बंता से हाथ मिलाया। -तुम तो काफी मशहूर हो । संता ने खाना खाते खाते बंता के कान में फुसफुसाया। - मैं दुनिया का सबसे प्रसिद्ध आदमी हूं। बंता ने बताया । - नहीं यार । अब इतने भी मत बनो । ये कुछ लोग तुम्हें जानते हैं इसका मतलब यह नहीं कि तुम दुनिया के सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति हो। संता ने कहा । - हां ये सच है। तुम सिर्फ नाम बताओ । ऐसा कौन है जो मुझे नहीं जानता हो। बंता ने जवाब दिया। - अच्छा । मैं दस हजार की शर्त लगाता हूं कि मुख्यमंत्री तुम्हें नहीं जानता होगा । संता ने कहा । - ठीक है चलो । बंता ने कहा और अगले ही दिन वे राजधानी पहुंच गये। वहां पहुंचने पर संता ने देखा कि मुख्यमंत्री ने बंता को देखते ही पहचान लिया और गले लगाया। फिर दो दिन मुख्यमंत्री के घर मेहमाननवाजी करने के बाद वे घर लौट आये। - मैंने कहा था न कि मैं दुनिया का सबसे प्रसिद्ध आदमी हूं। अब तो मानते हो। - नहीं । हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री तुम्हें बिलकुल नहीं जानता होगा । अगर वह जानता हो तो मैं दुगने पैसे दूंगा। अगले ही दिन वे दिल्ली में थे। प्रधानमंत्री बड़ी बेतकल्लुफी से बंता से मिले । बोले - -कहां रहते हो बंता यार । तुम्हें देखे हुये तो जमाना बीत गया। फिर तीन दिनों तक प्रधानमंत्री के साथ गोल्फ खेलकर वे घर लौट आये। संता हैरान था पर हार मानने को तैयार नहीं था। - मैं एक एक लाख रूपये देने को तैयार हूं अगर अमिताभ बच्चन तुम्हें पहचान ले तो। - ठीक है । जैसी तुम्हारी मर्जी । अगले दिन वे मुम्बई में अमिताभ बच्चन के घर पहुंचे। बंता ने संता से बाहर लॉन में खड़े रहने को कहा और खुद अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद संता ने देखा कि अमिताभ बच्चन और बंता बाहों में बाहें डाले बालकनी में आ रहे हैं। बंता ने संता की ओर देखा और हाथ हिलाया। इसके बाद संता बेहोश होकर गिर पड़ा। बंता दौड़कर नीचे आया और पानी के छींटे देकर संता को होश में लाने की कोशिश करने लगा।  - संता, संता तुम्हें क्या हुआ ? उठो। संता ने धीरे से आंखें खोलीं और कहा - बंता तुम सचमुच दुनिया के सबसे प्रसिद्ध आदमी हो। - मैंने तुमसे कहा था न पर तुम ही नहीं मानते थे। खैर ये बताओ कि जब मैं तुम्हें मुख्यमंत्री के घर ले गया तब तुम बेहोश नहीं हुये, प्रधानमंत्री के घर ले गया तब तुम्हें कुछ नहीं हुआ फिर अब ऐसा क्या हुआ कि तुम गिर पड़े। संता ने धीरे से बताया - जब तुम ऊपर अमिताभ बच्चन के साथ बालकनी में खड़े थे तो एक आदमी जो मेरे बगल में खड़ा था उसने मुझसे क्या कहा जानते हो ? क्या कहा ? - बंता ने पूछा उसने कहा - संता ने बताया - वह कौन है जो बंता जी के साथ ऊपर बालकनी में खड़ा है।

Sunday, July 27, 2008 10:38:05 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक औरत अपने पति की कब्र पर पंखा झल रही थी। एक राहगीर उसकी यह पति भक्ति देखकर ठिठक कर रुक गया। उसने पास जाकर कहा - बहन जी, अब तो यह मर गया है । अब इस पर पंखा झलने से क्या फायदा ?

औरत ने ठंडी सांस लेकर कहा - मैं इस कब्र को जल्द सुखाने की कोशिश कर रही हूं क्योंकि हमारे यहां का कायदा है कि जब तक पति की कब्र सूख न जाए, औरत दूसरी शादी नहीं कर सकती .....

Sunday, July 27, 2008 10:31:56 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक फिल्म अभिनेता पत्नी को अपनी फिल्म दिखाने ले गया। पत्नी ने जब देखा कि उसका पति हीरोइन के साथ बड़े जोर-शोर से रोमांस कर रहा है तो उससे रहा नहीं गया। पति से बोली - तुम मुझे तो कभी इस तरह प्यार नहीं करते, इसे क्यों कर रहे हो ?

अभिनेता बोला - इसे प्यार करने के मुझे पचास लाख मिले हैं ........

Sunday, July 27, 2008 10:29:24 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Saturday, July 26, 2008
किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा

कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा

काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा

किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा

देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा

आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,
क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है. .

चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,
तोह चाँद की चाहत किसे होती.

कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,
तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.

कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,
इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,

जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,
न बताकर बेवफाई मत करना.

दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है
अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है

दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,
अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है
Saturday, July 26, 2008 11:33:15 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Monday, July 21, 2008
मुझसे मुंह मोड़ कर तुम को जाते हुए,
मूक दर्शक बना देखता रह गया ,
क्या मिला था तुम्हें दिल मेरा तोड़ कर,
जिंदगी भर यही सोचता रह गया ???

भूलने के लिये तुमको हम ने जतन,
क्या नहीं हैं किये ए जान-ऐ-मन,
उतने ही याद आये हो तुम रात दिन,
अपनी यादों से मैं जूझता रह गया???
 
रास्ता जब बनी रास्ते की गली,
मैं जो गुजरा कभी धडकने बढ़ गयी,
एक खिड़की खुली और तुम्हें देख कर,
मैं जहाँ पर खडा था खडा रह गया???
जिदगी भर यही सोचता रह गया”
Monday, July 21, 2008 12:11:51 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

काँटों की चुभन सी क्यों है तन्हाई
सीने की  दुखन  सी  क्यों   है  तन्हाई,

ये  नजरें  जहाँ  तक  मुझको  ले  जांयें ,
हर  तरफ  बसी  क्यों  है  सूनी  सी   तन्हाई

इस  दिल  की  अगन  पहले  क्या  कम  थी ,
मेरे  साथ  सुलगने  लगती  क्यों  है  तन्हाई

आंसू  जो  छुपाने  लगता  हूँ  सबसे ,
बेबाक  हो  रो देती  क्यों   है  तन्हाई

तुझे  दिल  से  भुलाना  चाहता  हूँ ,
यादों के भंवर मे उलझा देती क्यों है तन्हाई 

एक  पल  चैन  से  सोंना  चाहता  हूँ ,
मेरी  आँखों मे जगने लगती क्यों है तन्हाई 

तन्हाई से दूर नही अब रह सकता,

मेरी सांसों  मे,  इन  आहों मे,
मेरी रातों मे,  हर बातों मे,
मेरी आखों मे, इन ख्वाबों मे,
कुछ अपनों मे, कुछ सपनो मे ,
मुझे अपनी सी लगती क्यों है तन्हाई ????

Monday, July 21, 2008 12:09:37 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, July 20, 2008

जिसके नयनों की नदी में बह जाता हो हर दुख, आँचल की नम भूमि पर फूट आती हों, नन्हीं कोंपलें नए जीवन का संदेश देती हुई, जिसकी बाँहों का आकाश सदा खुला रहता हो अरमानों के पंछियों के लिए, उस नारी की जब भी बात आती है, मैं गौरांवित हो जाता हूँ यह सोचकर कि मैं एक नारी का हमसफ़र हूँ......फिर चाहे बात जीवन की निरंतता की हो, चंचलता की हो या सुंदरता की............

आपने कभी गौर किया है कि जब भी सौंदर्य जैसे शब्द आते हैं, तो नारी के देह को नज़र अंदाज नहीं कर पाता कोई, फिर चाहे अजंता एलोरा की मूरत हो, फिर चाहे गुलज़ार का गीत (तेरे कमर के बल से नदी मुड़ा करती थी, हँसे तो गालों पर भँवर पड़ा करते थे, और वो.....ज़ुल्फों के नीचे गर्दन पर सुबह शाम मिलती रहे)....... यह सब एक पुरुष ही लिख सकता है, नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में..... डोंट माइंड, जब भी कोई नारी सजती-सँवरती है, तो खुद को किसी कवि की कल्पना से कम नहीं समझती, उसका अपना एक स्टाइल होता है.........

हाँ तो मेरा पसंदीदा परिधान...जी हाँ साड़ी, रंग?? जो मुझे खुश आकर्षित कर जाए । प्लेन साड़ियाँ, ह्म्म्म्म्म्म्म, आइ एम लविंग इट...फिर भी फ्लोरल प्रिंट्स यानि खुशनुमा सुबह की शुरुआत, बड़ी बिंदी....हमेशा रॉयल फील होता है....थोड़ा-सी परिपक्वता आ जाती है चेहरे पर, हाँ तब नज़रें चुरा लेती है नारी... यु नो आँखों की किलकारियाँ बाज नहीं आती।
लेकिन पता नहीं क्यों आजकल बालों से झाँकते उम्र के ताने बुरे नहीं लगते, इसलिए छुपाती नहीं नारी , अकसर बाल खुले रखती है वो , हर साल हेअर स्टाइल बदलती है, बड़ी ज्वेलरी, बिड्स और स्टोन हो तो सोने पर सुहागा।

बहुत हो गया नारी के बारे में, अब आइए थोड़ा जनरलाइज़ कर देते हैं स्टाइल को। पसंदीदा परिधान ....महिलाओं के लिए साड़ी, लड़कियाँ....10 में से 9 लड़की आपको सिर्फ जींस और टॉप में नज़र आएँगी। यु नो मोर कम्फर्टेबल..... कौन दुपटा संभालता फिरे?? आजकल कान में लम्बी बालियों का फैशन है, और हाँ, लाँग स्कर्ट को कैसे भूल सकते हैं। उसे देखकर कम से कम युवाओं में आज भी ट्रेडिशनल टच के जीवंत होने की संतुष्टि रहती है।

हमारे जयपुर में कपड़ों के लिए बहुत बड़ा बाजार है, जहाँ देखो वहाँ इंद्रधनुषी रंगो की छटा बिखरी हुई नज़र आती है। चूडियों का बाजार, जहाँ त्योहारों पर तो पैर रखने की जगह नहीं होती। वहाँ से गुज़रो तो लगता है प्रकृति ने सारे रंग सिर्फ नारी के सौंदर्य को बढ़ाने के लिए ही बनाए है, (पुरुष वर्ग इस बात को लेकर मुँह न बिगाड़े, व्यक्ति कितना ही मोडर्न हो जाए, नारी को लेकर उसकी कल्पना आज भी बीसवीं सदी से आगे नहीं बढ़ी, आज भी उसके सपनों की मल्लिका उसे शुद्ध पारंपरिक परिधान में लिपटी, झुकी हुई नज़रों को चंचलता से उठाती हुई, पैर के अँगूठे से ज़मीन को कुरेदती हुई, शर्माती हुई ही नज़र आती होगी, ऐसा मुझे लगता है। आपकी कल्पना मेरी कल्पना से अलग भी हो सकती है!!!)....

Only For Ladies….जानबूझकर यह टाइटल रखा है... पुरुषों की जिज्ञासा को बहुत अच्छे से जानता हूँ.................हाँ तो जो पुरुष यह पढ़ रहे हैं उनके लिए खास टिप्स...टीनएजर्स- लो वेस्ट जींस में, उसके बाद की उम्र वाले जींस, टी-शर्ट और रफ एण्ड टफ लुक में, उसके बाद सफेदी की झनकार वाली ऑफिशियल शर्ट या स्ट्राइप्स वाली शर्ट्स में, पार्टी में नए स्टाइल का कोई भी सूट या डिज़ाइनर शर्ट...............यह आम महिलाओं की पसंद है पुरुष परिधानों में....लेकिन हाँ, टी-शर्ट आप अपनी पर्सनालिटी को सूट करता हुआ ही पहनें........

देखा बात शुरू हुई थी नारी के सौंदर्य से और खत्म हुई पुरुष परिधानों पर .....ऐसा कुछ भी नहीं है जो Only for ladies... या Only for gents ho... दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। सुंदरता शब्द के साथ अगर नारी का ज़िक्र होता है तो सुंदरता को परिभाषित करने के लिए हैं पुरुष, क्योंकि नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में.....

Sunday, July 20, 2008 7:29:38 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

१.
मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने

रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे

२.
सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा(भिक्षापात्र)
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें

सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।

३.
सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर

कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।

४.
शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को

तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?

'५.
ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी

खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!

६.
लोग मेलों में भी गुम हो कर मिले हैं बारहा
दास्तानों के किसी दिलचस्प से इक मोड़ पर

यूँ हमेशा के लिये भी क्या बिछड़ता है कोई?

७.
आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!

चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा

८.
पौ फूटी है और किरणों से काँच बजे हैं
घर जाने का वक्‍़त हुआ है,पाँच बजे हैं

सारी शब घड़ियाल ने चौकीदारी की है!

९.
बे लगाम उड़ती हैं कुछ ख्‍़वाहिशें ऐसे दिल में
‘मेक्सीकन’ फ़िल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे।

थान पर बाँधी नहीं जातीं सभी ख्‍़वाहिशें मुझ से।

१०.
तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे
हवा धकेल के दरवाजा़ आ गई घर में!

कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो!!

११.
कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे

ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

१२.
वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था

फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।

१३.
वह जिस साँस का रिश्ता बंधा हुआ था मेरा
दबा के दाँत तले साँस काट दी उसने

कटी पतंग का मांझा मुहल्ले भर में लुटा!

१४.
कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई साथ आया था,उन्हें ले गया,फिर नहीं लौटे

शेल्फ़ से निकली किताबों की जगह ख़ाली पड़ी है!

१५.
इतनी लम्बी अंगड़ाई ली लड़की ने
शोले जैसे सूरज पर जा हाथ लगा

छाले जैसा चांद पडा़ है उंगली पर!

१६.
बुड़ बुड़ करते लफ्‍़ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको और मसल दो पैर की ऐड़ी से ।

अफ़वाहों को खूँ पीने की आदत है।

१७.
चूड़ी के टुकड़े थे,पैर में चुभते ही खूँ बह निकला
नंगे पाँव खेल रहा था,लड़का अपने आँगन में

बाप ने कल दारू पी के माँ की बाँह मरोड़ी थी!

१८.
चाँद के माथे पर बचपन की चोट के दाग़ नज़र आते हैं
रोड़े, पत्थर और गु़ल्लों से दिन भर खेला करता था

बहुत कहा आवारा उल्काओं की संगत ठीक नहीं!

१९.
कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से

टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को!

२०.
कोने वाली सीट पे अब दो और ही कोई बैठते हैं
पिछले चन्द महीनों से अब वो भी लड़ते रहते हैं

क्लर्क हैं दोनों,लगता है अब शादी करने वाले हैं

२१.
कुछ इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में

अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा!

२२.
कांटे वाली तार पे किसने गीले कपड़े टांगे हैं
ख़ून टपकता रहता है और नाली में बह जाता है

क्यों इस फौ़जी की बेवा हर रोज़ ये वर्दी धोती है।

२३.
आओ ज़बानें बाँट लें अब अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात, ना हमको समझना है।

दो अनपढ़ों कि कितनी मोहब्बत है अदब से

२४.
नाप के वक्‍़त भरा जाता है ,रेत घड़ी में-
इक तरफ़ खा़ली हो जबफिर से उलट देते हैं उसको

उम्र जब ख़त्म हो ,क्या मुझ को वो उल्टा नहीं सकता?

२५.
तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे

ये तुमने होंठों पे अफसाने रख लिये कब से?

Sunday, July 20, 2008 7:22:32 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

ये हिंदुस्तान को क्या हो रेला है भई? इन्डिया से शादीशुदा बालबच्चेदार मित्र चैटिया रहे हैं. शकीरा अपने इंडिया मे आ रेली बाबा! उसका वो गाना देखाना है “हिप्स डोंट लाई!” अर्थात नितंब असत्य नहीं बोलते. हम बोले -

अबे आती है तो आने दे तेरे को क्या?
अबे पता है एक टिकट कित्ते की?
कित्ते की?
३६५० रुपये की!
क्या? चरया गया है क्या साईं?
बंदा ज्यादा बकझक करने के बज़ाए कडी थमा देता है -
देख ले भई!
अबे रुक.
मैं दनाक से केल्कुलेटर खोल के ४३.९३ आजकल के कंवर्जन रेट से भाग दे कर देखता हूं ताकी मामला अपनी डिफ़ाल्ट करंसी मे समझ में आए  -

अबे ८३ डालर!!
हव्व
कौन जाएगा देखने?
जनता जाएगी
देसी जनता?
हव्व!
इत्ता पैसा है उनके कने?
हव्व!
क्या बोल रिया है बे?
सही बोल रिया हूं यार!!

शकीरा मेरी फ़ेवरेट पॉप कलाकार हैं, लेकिन इस भाव में तो मैं उनका कंसर्ट कतई ना देखूं!

*-*-*

कल अंतर्यामिणी बता रही थीं की शहर में ‘लायन किंग’ कंसर्ट हाल में शो करने आएंगे. शायद दफ़्तर वालों की कंसर्ट हाल को दी जाने वाली कार्पोरेट स्पांसरशिप के चलते मिलने वाली मुफ़्त टिकटें पाने का मौका हाथ लगे तो देख आएं.

पत्नी: और अगर टिकटें ना मिलें तो?
स्वामी: हमऊं खरीद के देख लेंगे!
पत्नी: हे हे पता है एक टिकट कितने की है?
स्वामी: कित्ते की?
पत्नी: ८० डालर
स्वामी: रहने दे भई, ये ज़रा महंगी है. हम बिना लायन किंग के ही भले.

भईये अपने इंडिया की महंगाई देख कर तो यहां बैठ के पसीना आ जाता है उससे ज्यादा वहां का उपभोक्तावाद देख कर. मेरे हाई थिंकिंग सिंपल लिविंग वाले इंडिया को अमरीका की हवा लग गई है. लगता है ये नव-भोक्ता चलते दुनिया को पीछे छोड देंगे!

*-*-*

मैं अपने से जरा दूर वाले दफ़्तर में बैठी अमरीकी महिला से पूछता हूं - औसत कंसर्ट का टिकट कितने का होता है? वो बोली “५०-६०.. लेकिन मैं काफ़ी समय से किसी कंसर्ट में नही गई!”

मैं मुस्कुरा देता हूं - मैं भी नहीं गया! लेकिन मेरे भारतीय मित्र शकीरा के कंसर्ट में जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं भारत में - अस्सी डालर का टिकट ले कर!
पागल हो गए हैं क्या? वो पूछती है!
उन्हें प्रत्यक्ष कंफ़र्म करना है की शकीरा के ’हिप्स डोंट लाई’!

इस भाव में?
हां!
सचमुच पागल हो गए हैं - इस प्रकार के कंसर्ट पर यहां वो बच्चे पैसा खर्च करते हैं जो खुद कमाते हैं फ़िर भी माता-पिता के साथ उनके घर में रहते हैं और अपनी कमाई से ऐश करते हैं वहां कौन करेगा ऐसी चीज़ पर पैसा खर्च?
भारत की जनता करेगी!
इतना पैसा है जनता के पास?
पता नहीं!

मुझे समझ नहीं आया हां बोलू या ना! अभी भी पशोपेश में हूँ!

Sunday, July 20, 2008 7:08:36 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

वाह री आलस्यधारी की व्यस्तता! काफ़ी दिन से कुछ लिखा नही - “जरा व्यस्त था!” व्यस्तता फ़ैशन मे है इस लिए नही, कुछ बचे हुए काम निपटा रहा था! बचे हुए काम यानी वो काम नही जो शुरू ही नही किए गए, बल्की वो काम जो शुरू तो किए गए पर कभी सिरे नही पहुंचाए गए. जैसे की फ़्रिज मे इकट्ठी हुई वो बची सब्जियां जिन्हें खत्म करने के चक्कर में एक दिन खाना बनाने कि छुट्टी हो जाती है वैसे ही इन बचे हुए कामों में कई दिन गुज़र जाते हैं! इसे समझ पता उस से पहले ही मैं भी एक रीसर्च करने लग पडा जो अपने आप मे एक और बचा हुआ काम बन गई है! वैसे तो आजकल गूगल पर अपने काम की साईट ढूंढ निकालना भी रीसर्च की श्रेणी में डाला जाता है लेकिन ये मामला अलग है. इस मे गूगल के अलावा याहू को भी झोंका गया था.

दर-असल मामला मीर की गज़ल से शुरु हुआ, मैं बचे काम निपटाता गज़लें सुन रहा था. एक शेर सुना और मैं आलसीयों पर शोध करने मे व्यस्त हो गया. वैसे तो ये शोध भी बहुत आलस में कर रहा हूं लेकिन इस के चलते मैं मेरे सबसे प्रिय मीर की परी रूह, उनकी जान-ए-गज़ल को एक नई रौशनी मे देख पाया हूं.

‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

नीम-बाज़ = अध-खुली

कहना ना होगा की मीर की जान-ए-गज़ल से कमतर कोई किरदार इस शोध से न्याय भी नही कर सकता था. गुणवत्ता के इस अनुपम मिलाप के नतीजे सामने हैं - शुरुआती नतीजा ये है की मीर की महबूबा सोने मे बडी उस्ताद और आलसी थी इसीलिए मीर महान हुए.  उपर वाले शेर में शायर मीर को अपनी आलसी मेहबूबा की उनींदी आँखे भी शराबी की आँखो जैसी मस्त लग रही हैं - उस के आलस्य का प्रभाव देखिये मीर एक झटके में गालिब से आगे निकल गए. भरोसा नही हो रहा? चलो देखो - मीर एक दूसरे शेर मे कहते हैं -

मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
कहां हम, कहां तुम, कहां फिर जवानी

शिकायत करूं हूं तो सोने लगे है
मेरी सर-गुज़िश्त अब हुई है कहानी

अव्वल तो मीर को उनकी परी रूह मिलती नही, मिलती है तो सो जाती है! मीर अपनी स्लीपिंग ब्यूटी पर शायरियां लिख कर अमर हो जाते हैं. महबूबा शायरियां झेलती सोई या सोई और फ़िर शायरियां की गईं ये विवाद का विषय है. फ़िर भी यह तय है की किसी भी स्थिती में, अगर मीर की महबूबा आलसी नही होती तो मीर महान नही होते. वो तो तारीफ़ कर के ही महान हो गए. ऐसी है आलसियों की महिमा!

शोध के पक्ष में आगे मीर की एक गज़ल है पहला शेर बहूत कंफ़्यूजिंग है. मीर क्लासीक शायर थे - ऐसे शेर का मतलब बनाने की जरूरत नही होती थी उस का मतलब होता था जिसे समझने की जरूरत होती थी लेकिन  इस वाली गज़ल मे मामला अलग है

गुल को महबूब में कयास किया
फ़र्क निकला बहुत जो बास किया

दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना
एक आलम से रू-शिनास किया

कयास=विचार, रुउ-शिनास=परिचित, बास किया = गंध सूंधी

मीर की महबूबा खूबसूरत तो थी लेकिन नहाती नही थी. उपर से डीयो भी नही लगाती थी. तभी जब मीर ने “बास” किया तो फ़र्क निकला! और इस की परिणिती में लिखी गई गजल मेरी रिसर्च का आधार स्तंभ बनी. तो उपरोक्त शेर मे मीर कह रहे हैं महबूबा दिखने में फ़ूल जैसी है मगर बास रही है (चूंकी आलस्य के मारे नहाई नही है).

वैसे शेर में बास का मतलब है खुशबू लेकिन इसे क्रिया के समान भिडा कर मीर ने एक और कमाल कर दिया. जैसा की स्पष्ट परिलक्षित है, आलस की और इन्टर्नेट की महिमा के चलते इस शोध के लिए किसी उस्ताद को गाईड नही बनाया गया है. शायरी या किसी भी किस्म की “कला” को समझने के पॉप और माडर्न रास्तों को मानते हुए मैनें शायरी को महसूस करने की कोशिश की और मीर की महानता के राज़ खुलने लगे!

हर जीव का एक स्थायीभाव होता है. जैसे मच्छर का स्थायीभाव है भिनभिनाना, बंदर का उछलना-कूदना - बिला वजह की व्यस्तता ऐसी व्यस्तता जिसका उत्पादकता से कोई सह-संबंध नही है. वहीं दूसरी तरफ़ अजगर/रीछ/साण्ड का स्थायी भाव है पडे/खडे रहना - आलस्य का सौंदर्य वाह! अचानक किसी फ़ितूर या आवश्यकता के दबाव में अल्पकालिक क्रियाशीलता और दोबारा पूर्वावस्था को प्राप्त होना. आलस्य का स्थायीभाव क्रियाशीलता की गति को भी तेज कर देता है - काम निपटे और फ़िर अपन जहां पडें वहां सडें! मीर की नायिका इस दूसरी श्रेणी की जीव है और उसका सौंदर्य कोई मीर जैसा ही समझ सकता है! उसका अलसाया हुआ बासता हुआ सौंदर्य, उस की सही व्याख्या ही मीर को महान बना देती है.

आज तक ये माना जाता था की यही आलसी जीव जब क्रीयाशील होता है तो जैसे एक ही बार में आगे पीछे की सारी कसर निकाल देता है. सारी संचित उर्जा का सदुपयोग हो जाता है! जैसे साण्ड भडक कर किसी का पीछा करने लगे. देखा गया है ऐन मौके पर अचानक साण्ड रुक जाता है पीछा करता है -आक्रमण नहीं. मेरी शोध का नतीजा है की आलस्य क्रियाशीलता के दौरान भी हावी होता है और उसका प्रभाव होता है. कैसे? - आलसी जीव काम करता है लेकिन अधूरा करता है और बाकी काम औरों के करने के लिए छोड देता है. ठीक वैसे ही जैसे मीर की नायिका मिलने तो आती है पर अनुग्रहित किए बिना सो जाती है. अब अनुग्रहित करने का काम कोई और करे - जान-ए-गज़ल है क्या कम है! काम पूरा होने से पहले आलस्य दोबारा जकड लेता है.

दिल-ए-पुर-खूं की इक गुलाबी से
उम्र भर हम रहे शराबी से

दिल दहल जाये है सहर से आह
रात गुज़ारी किस खराबी से

खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आँखों की नीम ख्वाबी से

[नीम_ख्वाबी = उनींदी/अधखुली/नींद से उठी हुई]

स्लीपिंग ब्यूटी अनुग्रहित करने अंखियां खोलती है और लो, आलस्य जकड लेता है फ़िर सो जाती है. रात खराबी मे गुजर रही है, मीर खुन्नस में नही आते वरन आलस्य की महिमा पे न्यौछावर होते उम्र बिता रहे हैं. काश सारे आलसी मीर की परी रूह जैसी किस्मत ले कर आए होते, बिना कुछ किए धरे नाम कमा चुके होते. रह रह के याद दिलाता है कोई - बहुत से बाकी काम बाकी पडे हैं! खैर.. हां शोध जारी रहेगी!

Sunday, July 20, 2008 7:03:11 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

रंग और नूर की इस दुनिया में
इस दिल का करार कहां पायें
इन बदलते हुये हालात में ,
वो प्यार का सिला हम कहां पायें

आप जो ख्वाब की दुनिया ले कर आये थे
आंख खुलते हि वो दुनिया कहीं नही पाये
रास्ते मे जो कांटे बिखरे थे
उसे चाह कर भी हुम छू नही पाये

बेशुमार प्यार भरा था इस दिल मे
आपका गुस्सा फ़िर भी कम नही कर पाये
अब सिर्फ़ इश्क हि उभरा है इन आंखों में
इस दिल को इन अश्कों मे डुबा नही पाये

प्यार के सिवा उलझन हि देखी हमारी हर बात में
लाख कोशिश के बाद भी आप को मना नहीं पाये
प्रेम के फूल चढाये हर वक्त आपके कदमों में
आपकी राहो मे सिर्फ़ कांटे हि हम बिखरा पाये

Sunday, July 20, 2008 6:54:34 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, July 18, 2008
प्यार को कभी भी किया नहीं जा सकता।
प्यार तो अपने आप हो जाता है।
दिन और रात... धरती और आसमान, एक दूसरे के बिना सब अधूरे हैं।
सन -सन करती हवाएं, सुन्दर नजारे, फूलों की खुशबू ... सभी में छिपा होता है प्यार...
कुछ तो प्यार में हारकर भी जीत जाते हैं,
तो कुछ जीतकर भी अपना प्यार हार जाते हैं।
प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें जो डूबता है वो ही पार होता है।
प्यार पर किसी का वश नहीं होता....
अगर आप भी प्यार महसूस करना चाहते हैं तो डूबिये किसी के प्यार में ...
दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है ढाई आखर का प्यार...
जब आप भी किसी को चाहने लगते हैं तो उसके दूर होने पर भी आपको नजदीक होने का अहसास होने लगता है ,
हर चेहरे में आप उसका चेहरा ढूंढने की असफल कोशिश करते हैं,
कोई पल ऐसा न गुजरता होगा जब उसका नाम आपके होठों पर न रहता हो ...
यही तो होता है प्यार...
सुन्दर, सुखद , निश्छल और पवित्र अहसास।
पूरी दुनिया के सुख इस प्रेम में समाए हुए हैं।
यह शब्द छोटा होते हुए भी सभी शब्दों में बड़ा महसूस होता है।
केवल इतना सा अहसास मात्र ही आपको तरंगित कर देगा कि मैं उससे प्यार करता या करती हूं
 
Mind it............
Friday, July 18, 2008 9:48:04 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं
उनको क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया
किस लिए जीते हैं हम किसके लिए जीते हैं
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त!
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया

देखा है जिंदगी को कुछ इतना क़रीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
ऐ रूहे-उम्र जाग, कहां सो रही है तू
आवाज दे रहें पयम्बर सलीब से
इस रेंगती हयात का कब तक उठाएं बार
बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से

तुम अपना रंजो-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें उन की क़सम, ये दुख ये हैरानी मुझे दे दो
मैं देखूं तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिए अपनी निगहबानी मुझे दे दो
ये माना मैं क़ाबिल नहीं हूं इन निगाहों में
बुरा क्या है अगर इस दिल की वीरानी मुझे दे दो
वो दिल जो मैंने मांगा था मगर ग़ैरों ने पाया था
बड़ी शै है अगर उस की पशेमानी मुझे दे दो

मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया,
बरबादियों का सोग मनाना फिजूल था
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया,
जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया,
जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया,
गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहां
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया

:: साहिर लुधयानवी...

Friday, July 18, 2008 9:35:36 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
तुझे अपना बनाना चाहता हूँ

ज़रा भी दूर हो आँखों से जब तू
मैं मिलने का बहाना चाहता हूँ

मेरी आँखों में है तस्वीर तेरी
जिसे तुझ को दिखाना चाहता हूँ

जो गहरी झील सी आँखें है तेरी
में इन में डूब जाना चाहता हूँ

जो बरसों की है दूरी तुझमें मुझमें
में लम्हों में मिटाना चाहता हूँ

घटा सावन की तू मैं खेत सूखा
मैं प्यास अपनी बुझाना चाहता हूँ

ग़मों से उमर भर पाला पड़ा है
मैं अब हँसना हँसाना चाहता हूँ

ग़ज़ल है तू मेरी मैं तेरा शायर
तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

Friday, July 18, 2008 9:33:52 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
झिलमिल सी एक लड़की
हवा के संग - संग लहराती सी
कुछ - कुछ नाराज़ ज़िंदगी से
और कुछ - कुछ ज़िंदगी पे मुस्कुराती सी !

किनारे की लहरों सी उठती बिखरती
नाव के जैसे डगमगाती सी
अंधेरे में पानी के किनारे कहीं
जुग्नो - ओं के संग जगमगाती सी !

ख्यालों में खोकर लातों को अपनी
कभी सुलझती कभी उलझती सी
नजाकत से जुल्फों को झटक फ़िर अपनी
धीमे से पलकें झुकाती सी !

चंचल सी नज़रें हस पडें जब अचानक
उस हसी को हया से फ़िर छुपाती सी
जो नाराज़ हो तो आँखें फैलाकर
गुस्से से मुहँ फुलाती सी !

कभी लफ्ज़ के सहारे छु लेती दिल को
कभी नज़रों से ही दास्तानें सुनती सी
कभी मुश्किलों से न डरने वाली
अंधेरे में मासूमियत से घबराती सी !

झिलमिल सी वो एक लड़की
परदे के पीछे शर्माती सी
एक पल को नज़र मिलाके मुझसे
नज़र के साथ दिल भी चुराती थी
Friday, July 18, 2008 9:05:29 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
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तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
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