Sunday, August 17, 2008

कल ही देखा कुछ बच्‍चे मिट्टी पर
अपने हाथों का निशान बनाकर
उसमें रेखाएँ बना रहें थे
फिर कही से हवा का झोंका आया
और हाथों पर बनी उन लकीरों को
कहीं-कहीं भर गया तो कहीं से
उसका रूख दूसरी तरफ कर दिया
अचानक ख्‍याल आया काश!!
हमारे हाथों की रेखाएँ सच में
मिट्टी की होती
आँसूओं से भीगती,
सौंधी सी खुशबू देती,
या तो तूफान में बह जाती
या हवा के रूख से बदल जाती
कभी ऐसा होता तो मैं
रोज़ अपनी तकदीर को
तेरे दर तक खींच लाता और
तुझे अपनी रेखाओं से कैद कर लेता!!!

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