Friday, October 24, 2008

करवट की वजह से जब भी नींद खुल जाती है तो अधूरे ख्वाबों को पकड़ने की कोशिश करता हूँ. कभी मन करता है की खुले आकाश के नीचे बस हाथ फैलाये बिना कुछ कहे घंटों खड़ा रहूँ. या कभी इन चंचल तितलियों के पंखों पर सवारी करने को मन करने लगता है. उनींदी आंखों से जो भी देखता हूँ सच मान लेता हूँ. मुझे कभी पहाड़ लुभाते हैं तो कभी लोग. लोगों को जानने, उनसे बात करने की, उन्हें सुनने की ख्वाहिश सदा साथ रहती है. कुछ भी जो लीक से हटकर है मुझे पसंद है.
ज़िन्दगी को हमेशा पर्दे में ही मिलता हूँ, सुना है बहुत खूबसूरत है वो.

Comments are closed.
Search
Navigation
On this page....
Archives
<January 2009>
SunMonTueWedThuFriSat
28293031123
45678910
11121314151617
18192021222324
25262728293031
1234567
Aggregate Me!
Feed your aggregator (RSS 2.0)
Categories
Blogroll
Contact me
Send mail to the author(s) E-mail
Themes
Pick a theme:
Administration