Saturday, October 11, 2008

अभी शादी का पहला ही साल था,
ख़ुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,

ख़ुशियाँ कुछ यूँ उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभाल रही थी,

सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना
थोड़ा शर्माते हुए हमे नीद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हुमरे बालों मे फिराना,
मुस्कुराते हुए कहना की डार्लिंग चाय तो पी लो,

जल्दी से रेडी हो जाओ, आप को ऑफीस भी है जाना.
घरवाली भगवान का रूप ले कर आई थी,
दिल ओर दिमाग़ पर पूरी तरह छाई थी,
साँस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
इक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था.
.
.
.
5 साल बाद……..
.
.
.
सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना,
टेबल पैर रख कर ज़ोर से चिल्लाना,

आज ऑफीस जाओ तो मुन्ना को
स्कूल छोड़ते हुए जाना…………..

एक बार फिर वोही आवाज़ आई,
क्या बात है अभी तक छोड़ी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर ख़ुद ही संभाल लेना.

ना जाने घरवाली कैसा रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग़ पे काली घटा छाई थी,
साँस भी लेते है तो उन्ही का ख़याल होता है,
हर समय ज़ेहन मैं एक ही सवाल होता है,
क्या कभी वो दिन लौट के आएँगे, हम एक बार फिर कुवारें नही हो सकते?

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