Sunday, November 02, 2008

दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
चिस्त मेरा तिहीदस्त रहा
मैं इशक करू तो कैसे करू
एक जहा ढूंडा गरचे हमने
वहा पर भी पर्दा नाशाद्काम
वो सात तहों के भीतर था
मैं आबादस्त था बिना जाम
लबरेज झलकते जामो का
इशआर करू तो कैसे करू ......
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
एक शाम इम्तिदादे कैफ लीये
जामे तरतीब पीये हमने
बादये कुहन के शीशो में
शब -ऐ-पैगाम जिए हमने
हर शाम तुलुअ की तारीकी
तन्हाइयो में रोया करते
बियाबान गुजरते पहलू में
महदूद करू तो कैसे करू
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू .................................................

Sunday, November 02, 2008 9:01:11 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

ऐ हवा मुझसे यू दगा ना कर,
मेरे जीने की फ़र्याद ना कर,
कोई छूत्ता है उसे तो होती हैं जलन,
ऐ हवा तू भी उसे छुआ ना कर .....

Sunday, November 02, 2008 8:24:36 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Thursday, October 23, 2008

ये धूप किनारा शाम ढले
मिलते हैं दोंनो वक्त जहाँ

जो रात न दिन, जो आज न कल
पल भर में अमर, पल भर में धुंआँ

इस धूप किनारे, पल दो पल
होठों की लपक, बाँहों की खनक
ये मेल हमारा झूठ न सच
क्यों रार करें, क्यों दोष धरें
किस कारण झूठी बात करें

जब तेरी समन्दर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोयेंगे घर-दर वाले
और राही अपनी राह लेगा

Thursday, October 23, 2008 8:09:31 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही

ना तन में खून फ़राहम ना अश्क आंखों में
नमाज़-ए-शौक तो वाजिब बे-वजू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदे वालों
नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हां-ओ-हु ही सही

ग़र इंतज़ार कठिन है तो जब तलक ए दिल
किसी के वादा-ए-फर्दा की गुफ्तगू ही सही

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोइ
तो 'फैज़' ज़िक्र-ए-वतन रु-ब-रु ही सही

Thursday, October 23, 2008 8:01:56 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।

हदीसे-यार1 के उन्वाँ2 निखरने लगते हैं
तो हर हरीम3 में गेसू सँवरने लगते हैं

हर अजनबी हमें मजरम4 दिखाई देता है
जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

सबा से करते हैं ग़ुरबत-नसीब5 ज़िक्रे-वतन
वो चश्मे-सुबह में आँसू उभरने लगते हैं

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ो-लब6 की बख़ियागरी7
फ़िज़ा में और भी नग़मे बिखरने लगते हैं

दरे-क़फ़स8 पे अँधेरे की मुहर लगती है
तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं

1. प्रेमी के संवाद
2. शीर्षक
3. विशेष कक्ष, जहाँ पर्दा हो
4. जानने वाला
5. जिनकी किस्मत में परदेस में भटकना लिखा हो
6. शब्द और होंठ
7. सिलाई
8. पिंजरे का दरवाज़ा

Thursday, October 23, 2008 8:00:05 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, August 31, 2008

दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
बल्कि दोस्त ही जिन्दगी बन जाते हैं, दोस्ती में..

जरुरत नहीं पडती, दोस्त की तस्वीर की.
देखो जो आईना तो दोस्त नज़र आते हैं, दोस्ती में..

येह तो बहाना है कि मिल नहीं पाये दोस्तों से आज..
दिल पे हाथ रखते ही एहसास उनके हो जाते हैं, दोस्ती में..

नाम की तो जरूरत हई नहीं पडती इस रिश्ते मे कभी..
पूछे नाम अपना ओर, दोस्तॊं का बताते हैं, दोस्ती में..

कौन केहता है कि दोस्त हो सकते हैं जुदा कभी..
दूर रेह्कर भी दोस्त, बिल्कुल करीब नज़र आते हैं, दोस्ती में..

सिर्फ़ भ्रम हे कि दोस्त होते ह अलग-अलग..
दर्द हो इनको ओर, आंसू उनके आते हैं , दोस्ती में..

माना इश्क है खुदा, प्यार करने वालों के लिये "अभी"
पर हम तो अपना सिर झुकाते हैं, दोस्ती में..

ओर एक ही दवा है गम की दुनिया में क्युकि..
भूल के सारे गम, दोस्तों के साथ मुस्कुराते हैं, दोस्ती

दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
बल्कि दोस्त ही जिन्दगी बन जाते हैं, दोस्ती में..

जरुरत नहीं पडती, दोस्त की तस्वीर की.
देखो जो आईना तो

Sunday, August 31, 2008 4:25:03 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 29, 2008
बरसों से दीये जलाते हैं
मुद्दतों से अजान होती हैं
वक्त बेवक्त याद करते हैं तुझे
जब भी जिन्दगी परेशान होती हैं..

"खुदा भी राजमर्रा की बातो पर गौर नहीं करता हैं"
Friday, August 29, 2008 1:01:00 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Monday, August 18, 2008

मंजिल मिली, मुराद मिली, मुद्दआ मिला
सब कुछ मुझे मिला जो तेरा नक्श-ए-पा मिला
- सीमाब अकबराबादी

अब क्या बताऊं मैं तेरे मिलने से क्या मिला
इरफान-ए-गम हुआ मुझे दिल का पता मिला
- सीमाब अकबराबादी

बात साकी की न टाली जाएगी
करके तौबा तोड़ डाली जाएगी
- हबीब जलील

गम मुझे, हसरत मुझे, वहशत मुझे, सौदा मुझे
एक दिल देके खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे
- सीमाब अकबराबादी

दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले
हम अपने बुजुर्गों का जमाना नहीं भूले
- सागर आजमी

मैयत न मेरी जा के वीराने में रख देना
पैमानों में दफना के मैखाने में रख देना
- सीमाब अकबराबादी

कांटों से गुजर जाना, शोलों से निकल जाना
फूलों की बस्ती में जाना तो संभल जाना
- सागर आजमी

किस-किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया
गैरों का नाम मेरे लहू से लिखा गया
- शहरयार

मैनोशी के आदाब से आगाह नहीं है तू
जिस तरह कहे साकी-ए-मैखाना पिए जा
- अख्तर शीरानी

मैं नजर से पी रहा हूं, ये समां बदल न जाए
न झुकाओ तुम निगाहें, कही रात ढल न जाए
- अनवर मिर्जापुरी

पहलू से दिल को लेके वो कहते हैं नाज से
क्या आएं घर में आप ही जब मेहरबां न हों
- मौलाना मुहम्मद अली जौहर

सारी दुनिया सो जाती है, मैकश हम उठकर रोते हैं
किस तरह गुजरती हैं रातें, तुम क्या समझो, तुम क्या जानो
- मैकश

Monday, August 18, 2008 8:30:08 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 01, 2008

देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा

कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा

अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा

जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा

Friday, August 01, 2008 11:36:32 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
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