Friday, November 21, 2008
 Sunday, November 02, 2008

दोस्तों मै आज, एक अपनी महिला मित्र की रचना यहाँ लिख रहा हु....

अब इसे रचना कह कर मैं इसका मजाक नहीं उडाना चाहता, ये उस की दिल की एक आवाज है...
वैसे ये बहुत कम लिखती है लेकिन जब भी लिखती है तो बहुत अच्छा लिखती है। दिल को छू लेता है॥

आज फ़िर आंखो में नमी सी थी,
आज फ़िर कयी "इल्ज़ाम" लगे हैं तेरे जाने के बाद,
कितना अजीब रिश्ता है तेरा मेरा कि, आज भी लोग ताने देते है मुझे तेरे नाम से,
और याद दिलाते है कि हम कभी साथ थे........
फ़िर से माँ ने कहा मुझे तेरे लिये, पर उन्हे नहीं पता अब "अब साथ" नही...........
एक आँसु था बस इन आँखों में, और कुछ नही..........

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Sunday, November 02, 2008 8:50:58 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, October 24, 2008

करवट की वजह से जब भी नींद खुल जाती है तो अधूरे ख्वाबों को पकड़ने की कोशिश करता हूँ. कभी मन करता है की खुले आकाश के नीचे बस हाथ फैलाये बिना कुछ कहे घंटों खड़ा रहूँ. या कभी इन चंचल तितलियों के पंखों पर सवारी करने को मन करने लगता है. उनींदी आंखों से जो भी देखता हूँ सच मान लेता हूँ. मुझे कभी पहाड़ लुभाते हैं तो कभी लोग. लोगों को जानने, उनसे बात करने की, उन्हें सुनने की ख्वाहिश सदा साथ रहती है. कुछ भी जो लीक से हटकर है मुझे पसंद है.
ज़िन्दगी को हमेशा पर्दे में ही मिलता हूँ, सुना है बहुत खूबसूरत है वो.

Friday, October 24, 2008 10:02:15 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, October 19, 2008

मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ 

पांचवी कक्षा की एक क्लास मे मास्टर ने बच्चों से पूछा
बताओ क्या बनोगे, कैसे  करोंगे अपने माँ-बाप का नाम ऊँचा
किसी ने IAS. किसी ने PCS. किसी ने कहा अच्छा  आदमी बनाना चाहता हूँ
तभी पीछे की सीट से उठकर एक बच्चे ने कहा
Sir! मैं  इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ

ऐसे जवाब की ख्वाब मे भी नही की थी कभी कल्पना
पर Teacher को लगा शायद हो ये  लडके का बचपना
समझाया की बेटा गलती की है तुने Career को चुनने मे
ये तो बता  क्या प्रॉब्लम है तुझे और कुछ बनने मे ???

लड़का बोला Sir! जॉब मे अभी कहाँ इतना पैसा है
और Business करना मुझे लगता  बेवकूफों जैसा है
नेता फस जाते हैं Akshar स्टिंग ऑपरेशन के जंजाल मे
खेल मे Zahar भर दिया मैच फिक्सिंग के बवाल ने
पर फ़िल्म इंडस्ट्री मे प्रोफिट की लाइन  हमेशा ऊपर चढ़ती है
बढ़िया काम से Price-Value तो बुरे से Popularity बढ़ती  है
और इस बात को तो ख़ुद कई बड़े फ़िल्म समीक्षक माने है
MMS Clips से भी  ज्यादा बिकते इमरान के फिल्मो के गाने है

मै भी ऐसे गाने कर अपनी लाइफ बदलना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी  बनाना चाहता हूँ

हुंह!!!! आज कल के लडके जाने पढ़ते हैं किस किताब से
Teacher का भी सर चक्र  गया बच्चे के इस जवाब से
Teacher ने फ़िर भी पूछा उसमे ऐसी क्या बात समाई  है
ये तो बता अभिषेक बच्चन बनने मे क्या बुराई है ???

सिर्फ़ दो फिल्मो से इतना नाम नही कमाया अभिषेक के बाप ने
Murder किया  लड़किया फ़िर भी कहती .Aashiq Banaya Aap Ne…
मल्लिका, तनुश्री, उदिता निपटी पिछली  फिल्मों की साइन मे
सुनाने मे आया है की अब सेलिना हृषिता भी है लाइन मे

मै भी ऐसे टेस्टी CHOCOLATE का स्वाद चखाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir मैं  इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ

अब मास्टर का गुस्सा पहुच गया सातवे आसमान पे
बोले.. सिवाय लड़किया घुमाने के  क्या किया इमरान ने ??
Sir! लड़कियों को पीछे घुमाना कोई आसान काम नही
वरना  बड़े Powerful लोगो का होता ये अंजाम नहीं

क्या नही जानते आप America के पूर्व राष्ट्रपति को ??
कैसे प्राप्त हुए  मोनिका के चक्कर मे .वीरगति को
बदल गया कप्तान देश का सौरभ-नग्मा के टक्कर मे
Cricket खेलना भूल गया वो .नए खेल के चक्कर मे
मेरी इतनी बातों का मतलब  बिलकुल सीधा-साफ है
काबिलियेत मे भी इमरान हाशमी. बिल क्लिंटन का बाप है

मैं भी एक Demanded और काबिल आदमी बनाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान  हाशमी बनाना चाहता हूँ

Sunday, October 19, 2008 3:23:56 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

दोस्तो॥ कुछ लो काज़ल "काज़ु" को जानते होंगे। ये मेरी एक महिला मित्र है। हां आप सब लोग यही सोचेंगे की मित्रता भी ऐसी लडकी से.... नीचे लिखे को पढ लीजिये,,, और फ़िर कहीयेगा॥

यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को
आज चला था पैसो से मैं यौवन  का सुख पाने को

दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे
अरमानों के साथ मैं पंहुचा  उस तड़ीता के दरवाजे पे

अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने था घेर लिया

हर कोई अपने यौवन के श्रृंगार से सुसज्जित था
पर अब जाने क्यों मेरा मॅन थोडा  सा लज्जित था

आहत होता था हृदय बहुत उन संबोधन के तीरों से
पर अभी भी मॅन था बंधा हुआ  संवेगों की जंजीरों से

तभी एक रूपसी पर अटकी मेरी दृष्टि थी
लगता था मानो स्वयं वही सुन्दरता की  सृष्टि थी

व्यग्र हुआ मॅन साथ में उसके स्वयं चरम सुख पाने को
उस कनकलता को लिए चला  अपनी कामाग्नि बुझाने को

जून के उष्ण महीने में बसंती सी हो गयी थी रुत
कुछ ऐसे अपने तन को उसने मेरे  समुख किया प्रस्तुत

खुला निमंत्रण था सपनो को आलिंगन में भरने का
पर नहीं समझ पा रहा था कारण  अपने अंतस के डरने का

अंतस को अनदेखा कर के प्रथम स्पर्श किया तन को
उस मद से ज्यादा मद-मादित अब  तक कुछ नहीं लगा मॅन को

खुद अंग ही इतने सुंदर थे लज्जा आ जाये गहनों को
पर सहसा सहम गया देख उस  मृग-नयनी के नयनो को

आँखों में कोई चमक नहीं चेहरे पे कोई भाव नहीं
सपने  कोई छीन गया जैसे जीने कोई चाह नहीं

प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों ने सारा मद तोड़ दिया पल में
व्याकुल था अंतस जानने को क्या है इसके हृदयातल में

उसे देख अवस्था में ऐसी जब रहा नहीं गया मुझसे
जो  उबल रहा था अंतस में वो सब कुछ बोल दिया उससे

आँखे सूना चेहरा सूना क्यों सूना तेरा जीवन  है
इच्छाओं के संसार में क्यों अब लगता नहीं तेरा मॅन है

सिर्फ तन का मूल्य दिया हूँ मैं, मॅन पर मेरा अधिकार  नहीं
पर इतना तो बता ऐ कनकलता क्या तुझको मैं स्वीकार्य नहीं

हे कामप्रिया!,हे मृगनयनी! ऐसी क्या विवशता है  तुझको
जो मॅन से मेरे साथ नहीं फिर तन क्यों सौप दिया मुझको

शांत भाव से बोली वो यहाँ मॅन को कौन समझता है
एक  लड़की के लिए गरीबी ही उसकी सबसे बड़ी विवशता है

इतना कह के फिर शांत हो गयी कुछ समझ नहीं आया  मुझको
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों से फिर मैंने झक-झोर दिया उसको

लड़ना ही जीवन है चाहे मुश्किल कितनी भी ज्यादा  हो
फिर नारी हो के क्यों तोड़ दिया तुमने अपनी मर्यादा को

कमी नहीं दुनिया में काम की पैसे इज्जत से कमाने  को
फिर क्यों बेच दिया खुद को बस अपनी क्षुधा मिटाने को ?

तड़प उठी वो मेरे ऐसे प्रश्नों के आघातों से
मुझसे  बोली क्या समझाना चाहते हो इन बातों से

शौक नहीं था वेश्या बन बाज़ारों में बिक जाने  का
अपने ही हाथों से खुद अपना आस्तित्व मिटाने का

पर आँखों के सारे सपने एक रोज बह गए पानी में
जब  माँ-बाप,घर-आँगन सब खो गए सुनामी में

फिर एक ही रात में बदल गयी मेरी दुनिया की तस्वीर  यहाँ
कठपुतली बना के बहुत नचाई मुझको मेरी तक़दीर यहाँ

दिन अच्छे हो जाते हैं राते भी अच्छी लगती हैं
भरे  पेट को सिद्धांत की हर बातें अच्छी लगती हैं

पर मई-जून की गर्मी से जब देह झुलसने लगती है
रोटी  के टुकड़े खोज रही आँखे कुछ थकने लगती हैं

भूख की आग में तड़प-तड़प मुश्किल से दिन कट पाते  हैं
अपनी बेबसी में घुट-घुट कर सपनों को जलाती रातें है

जब नीली छत के सिवा सर पर कोई और छत नहीं होती  है
कपडो के छेदों से झाँक रही मजबूरी खुद पे रोती है

गिद्धदृष्टि से देहांश देखता जब कोई चीर-सुराखों  से
तब मॅन छलनी हो जाता है तीर विष बुझे लाखों से

जब इन हालातों से लड़ लड़ कर जवानी थकने लगती है
तब  मर्यादा और सम्मान की ये बातें बेमानी लगने लगतीं है

लोगो ने जाने कितनी बार मन को निर्वस्त्र कर डाला  था
पर फिर भी किसी तरह मैंने अपना तन संभाला था

पर एक दिन कुचल गयी कली कुछ मदमाते क़दमों से
कुछ  और नहीं अब बाकी था इन किस्मत के पन्नों में

खुद को ख़त्म कर लेने का निश्चय कर लिया मेरे मॅन  ने
पर लाख चाहने पर भी दिल का साथ नहीं दिया हिम्मत ने

पर जीने का मतलब मेरे लिए हर मोड़ पर एक समझौता  था
फिर इस जगह से ज्यादा गया गुजरा मेरे लिए क्या हो सकता था

इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता  था
लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था

उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई  थी
दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थी

पर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला मैंने
हर  अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने

पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों  को
नहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को

क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन  को
क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को

काश कि मैं भी किसी को प्राणों से प्यारा कह  पाती
काश कि मैं भी किसी के हृदयातल में रह पाती

काश कि मेरे आँचल में भी एक अंश मेरा अपना  होता
ममता से पागल हो जाती एक बार जो मुझको माँ कहता

इतना कहते कहते ही उसकी आँखे भर आई थी
मैं भी था  खामोश वहाँ बस एक उदासी छाई थी

फिर मुझमे हिम्मत ही नहीं थी उससे कुछ कह पाने  को
धीमे क़दमों से लौट गया वापस गंतव्य पे जाने को

सोचता रहा ये रास्ते भर होके मानववृत्ति के अधीन
वो  चरित्रहीन थी या फिर दुनिया ही है चरित्रहीन

Sunday, October 19, 2008 3:17:54 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Saturday, October 11, 2008

एक दिन राजू के पापा एक रोबोट लेकर आए। वह रोबोट झूठ पकड़ सकता था और झूठ बोलने वाले को गाल पर खींचकर चांटा मार देता था।
आज राजू स्कूल से घर देर से आया था ...... पापा ने पूछा, ''घर लौटने में देर क्यों हो गई ?''
''आज हमारी एक्स्ट्रा क्लासेस थी'' - राजू ने जवाब दिया।
रोबोट अचानक अपनी जगह से उछला और राजू के गाल पर एक जोरदार चांटा मार दिया।
पापा हंसकर बोले, ''ये रोबोट हर झूठ को पकड़ सकता है। अब सच क्या है यह बताओ... कहां गए थे ?''
''फिल्म देखने'' - राजू ने गाल को सहलाते हुए जवाब दिया।
''कौनसी फिल्म'' - पापा ने कड़ककर पूछा ।
''जय हनुमान''
चटाक!..... अभी राजू की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसके गाल पर रोबोट ने एक जोर का चांटा मारा।
''कौनसी फिल्म'' - पापा ने फिर पूछा ।
''कातिल जवानी''
पापा गुस्से में बोले, ''शर्म आनी चाहिए तुम्हें। जब मैं तुम्हारे जितना था तब ऐसी हरकत नहीं किया करता था।''
चटाक!..... रोबोट ने एक चांटा मारा .... इस बार पापा के गाल पर।
यह सुनते ही मम्मी किचन में से आते हुए बोलीं, ''आखिर तुम्हारा ही तो बेटा है न! झूठ तो बोलेगा ही''
अब मम्मी की बारी थी ........ चटाक !

Saturday, October 11, 2008 10:54:03 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कुछ रोचक तथ्य...

1. कई बीवियां रखने में एक फायदा है; वे अपने पति से लड़ने की बजाय आपस में ही लड़ती रहती हैं।

2. खूबसूरत औरत आंखों के लिये स्वर्ग है, आत्मा के लिये नरक है, और जेब के लिये दिवाला है।

3. दुनिया में तीन चीजें हैं जिन्हें औरतें नहीं समझतीं - आजादी, बराबरी और भाईचारा।

4. सच्चा प्रेम भूत की तरह है - चर्चा उसकी सब करते हैं, देखा किसी ने नहीं।

5. कायर के एक लिये एक साहसिक कार्य खुला हुआ है और वह है - शादी।

6. दुनिया में दो ही ट्रेजडी हैं : एक आप इच्छित वस्तु को पा न सकें; दूसरी उसे पा जायें।

7. पत्ते अच्छे हों तो आदमी ईमानदारी से खेलना पसंद करता है।

8. अगर आप किसी बार बार आने वाले दुष्ट से पिण्ड छुड़ाना चाहते हैं तो उसे कुछ पैसा उधार दे दीजिये।

9. मां को अपने बेटे को आदमी बनाने में बीस बरस लगते हैं और एक अन्य महिला उसे बीस मिनिट में बेवकूफ बना देती है।

Saturday, October 11, 2008 10:47:42 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, September 14, 2008

ब्लैक होल का ख़तरा नहीं 

जेनेवा की मशीन चालू होते ही क्या पृथ्वी पर कोई ब्लैक होल बन जाएगा. अगर शीर्ष वैज्ञानिकों की मानें तो नहीं. लेकिन फिर भी कुछ गड़बड़ी की आशंका तो बनी हुई है ही. विज्ञान की कुछ पत्रिका तो इसे क़यामत की मशीन तक बता रही हैं.

स्विट्ज़रलैंड में जेनेवा के पास यूरोपीय मूलकण भौतिकी संस्थान सेर्न (CERN) संसार की एक ऐसी सबसे बड़ी प्रयोगशाला है, जिसने इस दिशा में क्रांतिकारी काम किये हैं और अब एक नयी ऊँचाई की ड्यौढ़ी पर खड़ी है. वहाँ पदार्थ के मूलकणों की गति बढ़ाते हुए उन्हें आपस में टकराने वाले संसार के अब तक के सबसे बड़े  ऐसे पार्टिकल एक्सिलरेटर (Particle Accelerator), अर्थात कणिका त्वरक का निर्माणकार्य पूरा होने वाला है, जो वैज्ञानिकों को ब्रह्मकण के दर्शन करा सकता है. लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (Large Hadron Collider)-- LHC--नामक इस त्वरक की सहायता से वैज्ञानिक उत्तर पाने की आशा कर रहे हैं कि ब्रह्मांड कैसे बना, किस चीज़ का बना हुआ है और वह कौन-सी शक्ति है, जो इस दुनिया को, ब्रह्मांड को, बाँधे हुए है?  लेकिन परीक्षण से पहले ही इस पर सवाल भी खड़े होने लगे हैं और यहां तक कहा जाने लगा है कि इससे पृथ्वी ब्लैक होल में बदल सकती है.

आशंका बेबुनियाद

27 किलोमीटर लंबी मशीनBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  27 किलोमीटर लंबी मशीन

लेकिन इस बीच पृथ्वी पर किसी ब्लैक होल के बनने और इसके नष्ट हो जाने की आशंका का पांच भौतिक वैज्ञानिकों ने एक साझे आकलन में खंडन किया है. उन्होंने लिखा है कि प्रकृति पृथ्वी पर अतीत में ऐसे लाखों प्रयोग कर चुकी है. इन वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रोटोन कणों को प्रकाश की गति से आपस में टकराने से यदि ब्लैक होल जैसे कोई कण बने भी, तो वे इतने सूक्ष्म होंगे कि तुरंत बिखर जायेंगे, क्योंकि उनमें अधिक समय तक बने रहने की ऊर्जा नहीं होगी. दो प्रोटोनों की टक्कर से जो ऊर्जा मुक्त होगी, वह दो मच्छरों के टकराने से पैदा हुई ऊर्जा के बराबर होगी, इसलिए कोई ऐसा ब्लैक होल नहीं बन पायेगा, जो पृथ्वी के अस्तित्व के लिए ख़तरा बन सके.

यहाँ इस समय एल एच सी नामक जिस महात्वरक को अंतिम रूप दिया  जा रहा है, वह वास्तव भूतल से कोई 100 मीटर की गहराई पर बनी 27 किलोमीटर लंबी एक वृत्ताकार सुरंग है, जिसमें तरह-तरह के पाइप, चुंबक, डिटेक्टर व अन्य उपकरण लगे हुए हैं.

15 मीटर लंबे, एक मीटर मोटे और 30 टन भारी पाइपों द्वारा आपस में जुड़े कुल 12 सौ अतिशक्तिशाली महाकाय चुंबक इस सुरंग में हइड्रोजन-नाभिकों, अर्थात प्रोटोनों को अपने चुंबकीय क्षेत्र में बनाए रखते हुए उनकी गति को त्वरित करेंगे और उन्हें आपस में टकराने पर विवश करेंगे. इस टक्कर से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होंगी, जैसी सृष्टि के जन्मदाता महाधमाके के समय रही होंगी और वैज्ञानिकों को भौतिक विज्ञान के कुछ मूलभूत प्रश्नों के उत्तर दे सकेंगी.

"हम यह जानने की आशा कर रहे हैं कि मूलकण किस चीज़ के बने हैं, इसकी व्याख्या करने वाला भौतिक शास्त्र का सर्वस्वीकृत मॉडल सही है या उसमें कोई फेरबदल करने पड़ेंगे. यह मॉडल, उदाहरण के लिए, यह नहीं बताता कि मूलकणों का एक निश्चित द्रव्यमान क्यों होता है? हम यह भी जानना चाहते हैं कि हिग्स-बोसोन  (Higgs-Boson) कहलाने वाले और भी सूक्षम कणों का अस्तित्व है भी या नहीं." -भौतिक वैज्ञानिक  फ़िलिप लेब्रून

क्या है सेर्न

मैर्केल भी देख चुकी हैं मशीनBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  मैर्केल भी देख चुकी हैं मशीन

हिग्स को ही इस समय ब्रह्मांड का ब्रह्मकण माना जा रहा है. समझा जाता है कि इस प्रकण के मिल जाने से इस प्रश्न का भी उत्तर मिल जायेगा कि क्वार्क (Quarks) और इलेक्ट्रॉनों को अपना द्रव्यमान (भार) कहाँ से मिला.

हिग्स-बोसोन मिल गये तो समझ लीजिये कि नोबेल पुरस्कार भी मिल गया. भौतिक विज्ञान के तथाकथित स्टैंडर्ड मॉडल का यही वह मर्म है, जिसकी सहायता से मूलकण भौतिकी के सारे प्रश्नों के उत्तर दिये जाते हैं, पर जिनका अस्तित्व अभी तक किसी प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं किया जा सका है. अब तक की प्रयोगशालाओं के त्वरक संभवतः इतने शक्तिशाली नहीं थे कि वे आपस में टराने वाले प्रोटोनों को पर्याप्त त्वरण-ऊर्जा प्रदान कर पाते.

सेर्न मूलकण भौतिकी के क्षेत्र में अनुसंधान का  विश्व का पहला केंद्र था. उसकी स्थापना यूरोप के 12 देशों ने मिल कर 1954 में की थी. इस समय फ्रांस के रोबेयर ऐयमार (Robert Aymar) उसके निदेशक हैं, किंतु 2009 में जर्मनी के रोल्फ़-डीटर स्विट्ज़रलैंड में सेर्न मुख्यालयBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  स्विट्ज़रलैंड में सेर्न मुख्यालय

होयर (Rolf-Dieter Heuer) निदेशक का पदभार संभालेंगे. इस समय 20 यूरोपीय देश सेर्न के सदस्य हैं और कोई तीन हज़ार लोग उसके नियमित कर्मचारी हैं. हर वर्ष दुनिया भर से लगभग 6 हज़ार वैज्ञानिक वहाँ शोधकार्य करने आते हैं. आज हम जिसे World Wide Web या Internet कहते हैं, उसका जन्म भी लगभग दो दशक पूर्व इसी प्रयोगशाला में हुआ था.

कैसे होगा प्रयोग

सेर्न का नया महात्वरक  एल एच सी प्रटोनों को लगभग प्रकाश जितनी गति प्रदान कर सकेगा--यानी लगभग तीन लाख किलोमीटर प्रतिसेकंड की गति. 27 किलोमीटर लंबी भूगर्भीय त्वरण रिंग में चल रहे आधे प्रोटोन घड़ी की सुई की अनुलोम और आधे विलोम दिशा से आते हुए  जहाँ आपस में टकरायेंगे, वहाँ एक बहुत ही कम समय के लिए एक बेहद घनी चिन्गारी- जैसी हरकत पैदा होगी. अनुमान है कि इस क्षणिक चिन्गारी में कुछ ऐसे नये कण,  प्रकण या उपकण हो सकते हैं, जो वैज्ञानिकों को सुराग दे सकते हैं कि वे सबसे मूल ईंटें कौन-सी हैं, जिनसे अणु-परमाणु और उनके इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन-जैसे संघटक अवयव बनते हैं और साथ ही  आपस में बाँधे भी रहते हैं.

प्रोटोनों की टक्करBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  प्रोटोनों की टक्कर

प्रोटोनों को  त्वरण रिंग में प्रति सेकंड 11 हज़ार बाहर एक-दूसरे की उलटी दिशा में दौड़ाया जायेगा और वे प्रति सेकंड 4 करोड़ बार आपस में टकरायेंगे. उन्हें उनके सही रास्ते पर दौड़ाने वाले चुंबकों को ठंडा रखने के लिए ऋण 270 डिग्री ठंडे तरल हीलियम की सहायता ली जायेगी.  त्वरण रिंग में होने वाली टक्कर को दर्ज करने के लिए सौ मीटर की गहराई पर चार बड़े-बड़े डिटेक्टर लगाये गये हैं. इन में एटलस नाम का सबसे बड़ा डिटेक्टर 25 मीटर व्यास वाला 46 मीटर ऊँचा एक विशालकाय यंत्र है. प्रटोनों की टक्कर और इस टक्कर से बनने वाले नये कणों को आँखों से देखा नहीं जा सकता, क्योंकि एक तो यह टक्कर एक सेकंड से भी लाखों-करोड़ों गुना अल्पकाल में पूरी हो जाती है और दूसरे, टक्कर से बने नये कण और भी कम समय में तुरंत बिखर जाते हैं.

डिक्टेर ऐसे महाकाय कैमरे हैं, जो बिखर रहे टुकड़ों की संख्या और उनके उड़नमार्ग को तुरंत माप सकते हैं. इन आँकड़ों की सहायता से वैज्ञानिक बाद में हिसाब लगा सकते हैं कि प्रोटोनों की टक्कर के समय कौन से नये कण-उपकण बने और बिखरे. इसी से यह सुराग भी मिल सकता है कि क्या उनके बीच हिग्स-बोसोन भी थे.

"एल एच सी और एटलस-जैसी परियोजनाओं पर कई-कई पीढ़ियों तक काम चालता है. मैं भाग्यशाली हूँ कि उस पीढ़ी के लिए काम कर रहा हूँ, जो इस डिटेक्टर और इस एक्सिलरेटर को चालू होते देखेगी. हमें दिलचस्प परिणाम और रोचक चीज़ें देखने को मिलेंगी." -जर्मन वैज्ञानिक क्लाउस बार्ट

रहस्यमयी पदार्थ

हिग्स-बोसोन के अलावा एक और ऐसे नये अतिसूक्ष्म मूलकण को लेकर वैज्ञानिक उत्साहित हैं, जिसे अंग्रेज़ी में Super Symmetric Particle, संक्षेप में SUSY (सूज़ी) कहते हैं. हिंदी में अर्थ हुआ अति समरूपी कण. सुपर सिमेट्रिक सिद्धांत का कहना है कि हर ज्ञात मूलकण का कहीं-न-कहीं एक और भी भारी प्रतिरूप होना चाहिये. जेनेवा में सेर्न प्रयोगशाला के नये सुपर त्वरक के द्वारा इस सिद्धांत की पुष्टि करने वाले कणों की भी खोज की जायेगी. बैज्ञानिकों के बीच अटकल लगायी जा रही है कि ब्रह्मांड में जिस तथाकथित  Dark Matter अर्थात काले द्रव्य की प्रधानता बतायी जाती है, वह कहीं  सुपर सिमेट्रिक कणों, यानी सूज़ी वाले कणों का ही तो नहीं बना है? काले द्रव्य या काले पदार्थ के बारे में कहा जाता है कि शायद यही रहस्यमय पदार्थ, किसी अदृश्य गोंद या सरेस की तरह,

तारकमंडलों और निहारिकाओं को बाँधे हुए है.

निश्चित है कि जेनेवा के नए त्वरक के चालू होते ही इन सारे प्रश्नों के उत्तर तुरंत नहीं मिल जायेंगे. इसमें समय लगेगा. वैसे, इस समय कुछ लोगों को यह प्रश्न सता रहा है कि नये त्वरक में प्रयोगों के दौरान यदि कहीं ऐसा कोई भारी पदार्थकण बना, जिससे ब्रह्मांड में मिलने वाले तथाकथित ब्लैक होल यानी काले विवर बने हैं, तब क्या होगा? ऐसा सुपर भारी कण बनते ही कहीं वह आसपास के अन्य कणों को खींच कर एक लघु ब्लैक होल तो नहीं बन जायेगा? पृथ्वी पर ब्लैक होल! इससे तो सत्यानाश ही पिट जायेगा! वह तो सारी पृथ्वी को निगल सकता है. ग़नीमत है कि शायद ही कोई वैज्ञानिक इसे संभव मानता है. सभी यही मानकर चल रहे हैं कि सेर्न का नया सुपर त्वरक ब्रह्मांड-रचना के सबसे मूल तत्वों के रहस्य को जानने की कुंजी सिद्ध होगा.

Sunday, September 14, 2008 10:20:32 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, August 17, 2008

कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों के साथ बहुत कुछ साथ है, कानों में घुलता संगीत, टेबल पर कुछ किताबें रखी हैं, पुखराज, वर्जित बाग की गाथा, कुछ अटके कुछ भटके, इन सभी के साथ शोभा डे का एक मोटा सा अंग्रेजी नॉवेल भी है- सुपर स्टार्स ऑफ इंडिया...........
ये सब मेरे साथ रोज ऑफिस आते हैं..........

उँगलियाँ अब भी चल रही है............

एक सौदा रात का एक कौड़ी चाँद की........

कानों में बज रहा है..........
दिमागी परतों पर करियर, पैसा, उम्र और समय का इम्प्रेशन बन रहा है, उसकी रेखाओं को थोड़ा और गहरा कर, उज्जवल भविष्य के सपनों के रंग भर रही हूँ..............
नज़र कभी-कभी मेज़ पर पड़ी किताबों पर पड़ रही है, जैसे पूछ रही हों उँगलियाँ थकी तो नहीं? पन्ने भी तो पलटने हैं तुम्हें इन्हीं उँगलियों से.....
गुलज़ार साहेब, मुदुला गर्ग, अमृता प्रीतम, और हाँ कुछ दिनों पहले शोभा डे को भी तो बुलवा लिया था............सबको एक उम्मीद की नज़र देकर समेटकर घर ले जाता हूँ.........
मेरी बहन के बच्चे जो थोडे दिनो पहले ही तो रहने आये थे मेरे घर... चॉकलेट का इंतज़ार कर रहे हैं, नीचे मेरी गाड़ी की आवाज़ के साथ ही बच्चों की आवाज़ें आ जाती है.....
किताबों को वादा करता हूँ, आज रात सारा काम निपटा कर अपनी नींद को ज़रूर धोखा दे दूँगा.........
सुबह हो गई है........किताबें जाग जाए इससे पहले उन्हें बेग में भरकर ऑफिस ले आता हूँ, कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों की खट-खट से सबकी नींद खुल जाती है.....
कुछ पल के लिए करियर के सपने से नज़रे चुरा ली तो आँखों में पुखराज चमकने लगा..........
लौ मेरी गोदी में पड़ा, रात की तन्हाई में
अकसर जिस्म जलता है तेरे जिस्म को छूने के लिए
हाथ उठते हैं तेरी लौ को पकड़ने के लिए
साँसें खिंच-खिंचके चटख जाती हैं तागों की तरह
हाँप जाती है बिलखती हुई बाँहों की तलाश
और हर बार यही सोचा है तन्हाई में मैंने
अपनी गोदी से उठाकर यह तेरी गोद में रख दूँ
रुह की आग में ये आग भी शामिल कर दूँ....गुलज़ार
पढ़ लिया...............लगा शायद कल रात किताबों के वादे के साथ एक वादा और भूल गई था..............

Sunday, August 17, 2008 9:21:02 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, July 20, 2008

जिसके नयनों की नदी में बह जाता हो हर दुख, आँचल की नम भूमि पर फूट आती हों, नन्हीं कोंपलें नए जीवन का संदेश देती हुई, जिसकी बाँहों का आकाश सदा खुला रहता हो अरमानों के पंछियों के लिए, उस नारी की जब भी बात आती है, मैं गौरांवित हो जाता हूँ यह सोचकर कि मैं एक नारी का हमसफ़र हूँ......फिर चाहे बात जीवन की निरंतता की हो, चंचलता की हो या सुंदरता की............

आपने कभी गौर किया है कि जब भी सौंदर्य जैसे शब्द आते हैं, तो नारी के देह को नज़र अंदाज नहीं कर पाता कोई, फिर चाहे अजंता एलोरा की मूरत हो, फिर चाहे गुलज़ार का गीत (तेरे कमर के बल से नदी मुड़ा करती थी, हँसे तो गालों पर भँवर पड़ा करते थे, और वो.....ज़ुल्फों के नीचे गर्दन पर सुबह शाम मिलती रहे)....... यह सब एक पुरुष ही लिख सकता है, नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में..... डोंट माइंड, जब भी कोई नारी सजती-सँवरती है, तो खुद को किसी कवि की कल्पना से कम नहीं समझती, उसका अपना एक स्टाइल होता है.........

हाँ तो मेरा पसंदीदा परिधान...जी हाँ साड़ी, रंग?? जो मुझे खुश आकर्षित कर जाए । प्लेन साड़ियाँ, ह्म्म्म्म्म्म्म, आइ एम लविंग इट...फिर भी फ्लोरल प्रिंट्स यानि खुशनुमा सुबह की शुरुआत, बड़ी बिंदी....हमेशा रॉयल फील होता है....थोड़ा-सी परिपक्वता आ जाती है चेहरे पर, हाँ तब नज़रें चुरा लेती है नारी... यु नो आँखों की किलकारियाँ बाज नहीं आती।
लेकिन पता नहीं क्यों आजकल बालों से झाँकते उम्र के ताने बुरे नहीं लगते, इसलिए छुपाती नहीं नारी , अकसर बाल खुले रखती है वो , हर साल हेअर स्टाइल बदलती है, बड़ी ज्वेलरी, बिड्स और स्टोन हो तो सोने पर सुहागा।

बहुत हो गया नारी के बारे में, अब आइए थोड़ा जनरलाइज़ कर देते हैं स्टाइल को। पसंदीदा परिधान ....महिलाओं के लिए साड़ी, लड़कियाँ....10 में से 9 लड़की आपको सिर्फ जींस और टॉप में नज़र आएँगी। यु नो मोर कम्फर्टेबल..... कौन दुपटा संभालता फिरे?? आजकल कान में लम्बी बालियों का फैशन है, और हाँ, लाँग स्कर्ट को कैसे भूल सकते हैं। उसे देखकर कम से कम युवाओं में आज भी ट्रेडिशनल टच के जीवंत होने की संतुष्टि रहती है।

हमारे जयपुर में कपड़ों के लिए बहुत बड़ा बाजार है, जहाँ देखो वहाँ इंद्रधनुषी रंगो की छटा बिखरी हुई नज़र आती है। चूडियों का बाजार, जहाँ त्योहारों पर तो पैर रखने की जगह नहीं होती। वहाँ से गुज़रो तो लगता है प्रकृति ने सारे रंग सिर्फ नारी के सौंदर्य को बढ़ाने के लिए ही बनाए है, (पुरुष वर्ग इस बात को लेकर मुँह न बिगाड़े, व्यक्ति कितना ही मोडर्न हो जाए, नारी को लेकर उसकी कल्पना आज भी बीसवीं सदी से आगे नहीं बढ़ी, आज भी उसके सपनों की मल्लिका उसे शुद्ध पारंपरिक परिधान में लिपटी, झुकी हुई नज़रों को चंचलता से उठाती हुई, पैर के अँगूठे से ज़मीन को कुरेदती हुई, शर्माती हुई ही नज़र आती होगी, ऐसा मुझे लगता है। आपकी कल्पना मेरी कल्पना से अलग भी हो सकती है!!!)....

Only For Ladies….जानबूझकर यह टाइटल रखा है... पुरुषों की जिज्ञासा को बहुत अच्छे से जानता हूँ.................हाँ तो जो पुरुष यह पढ़ रहे हैं उनके लिए खास टिप्स...टीनएजर्स- लो वेस्ट जींस में, उसके बाद की उम्र वाले जींस, टी-शर्ट और रफ एण्ड टफ लुक में, उसके बाद सफेदी की झनकार वाली ऑफिशियल शर्ट या स्ट्राइप्स वाली शर्ट्स में, पार्टी में नए स्टाइल का कोई भी सूट या डिज़ाइनर शर्ट...............यह आम महिलाओं की पसंद है पुरुष परिधानों में....लेकिन हाँ, टी-शर्ट आप अपनी पर्सनालिटी को सूट करता हुआ ही पहनें........

देखा बात शुरू हुई थी नारी के सौंदर्य से और खत्म हुई पुरुष परिधानों पर .....ऐसा कुछ भी नहीं है जो Only for ladies... या Only for gents ho... दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। सुंदरता शब्द के साथ अगर नारी का ज़िक्र होता है तो सुंदरता को परिभाषित करने के लिए हैं पुरुष, क्योंकि नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में.....

Sunday, July 20, 2008 7:29:38 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

ये हिंदुस्तान को क्या हो रेला है भई? इन्डिया से शादीशुदा बालबच्चेदार मित्र चैटिया रहे हैं. शकीरा अपने इंडिया मे आ रेली बाबा! उसका वो गाना देखाना है “हिप्स डोंट लाई!” अर्थात नितंब असत्य नहीं बोलते. हम बोले -

अबे आती है तो आने दे तेरे को क्या?
अबे पता है एक टिकट कित्ते की?
कित्ते की?
३६५० रुपये की!
क्या? चरया गया है क्या साईं?
बंदा ज्यादा बकझक करने के बज़ाए कडी थमा देता है -
देख ले भई!
अबे रुक.
मैं दनाक से केल्कुलेटर खोल के ४३.९३ आजकल के कंवर्जन रेट से भाग दे कर देखता हूं ताकी मामला अपनी डिफ़ाल्ट करंसी मे समझ में आए  -

अबे ८३ डालर!!
हव्व
कौन जाएगा देखने?
जनता जाएगी
देसी जनता?
हव्व!
इत्ता पैसा है उनके कने?
हव्व!
क्या बोल रिया है बे?
सही बोल रिया हूं यार!!

शकीरा मेरी फ़ेवरेट पॉप कलाकार हैं, लेकिन इस भाव में तो मैं उनका कंसर्ट कतई ना देखूं!

*-*-*

कल अंतर्यामिणी बता रही थीं की शहर में ‘लायन किंग’ कंसर्ट हाल में शो करने आएंगे. शायद दफ़्तर वालों की कंसर्ट हाल को दी जाने वाली कार्पोरेट स्पांसरशिप के चलते मिलने वाली मुफ़्त टिकटें पाने का मौका हाथ लगे तो देख आएं.

पत्नी: और अगर टिकटें ना मिलें तो?
स्वामी: हमऊं खरीद के देख लेंगे!
पत्नी: हे हे पता है एक टिकट कितने की है?
स्वामी: कित्ते की?
पत्नी: ८० डालर
स्वामी: रहने दे भई, ये ज़रा महंगी है. हम बिना लायन किंग के ही भले.

भईये अपने इंडिया की महंगाई देख कर तो यहां बैठ के पसीना आ जाता है उससे ज्यादा वहां का उपभोक्तावाद देख कर. मेरे हाई थिंकिंग सिंपल लिविंग वाले इंडिया को अमरीका की हवा लग गई है. लगता है ये नव-भोक्ता चलते दुनिया को पीछे छोड देंगे!

*-*-*

मैं अपने से जरा दूर वाले दफ़्तर में बैठी अमरीकी महिला से पूछता हूं - औसत कंसर्ट का टिकट कितने का होता है? वो बोली “५०-६०.. लेकिन मैं काफ़ी समय से किसी कंसर्ट में नही गई!”

मैं मुस्कुरा देता हूं - मैं भी नहीं गया! लेकिन मेरे भारतीय मित्र शकीरा के कंसर्ट में जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं भारत में - अस्सी डालर का टिकट ले कर!
पागल हो गए हैं क्या? वो पूछती है!
उन्हें प्रत्यक्ष कंफ़र्म करना है की शकीरा के ’हिप्स डोंट लाई’!

इस भाव में?
हां!
सचमुच पागल हो गए हैं - इस प्रकार के कंसर्ट पर यहां वो बच्चे पैसा खर्च करते हैं जो खुद कमाते हैं फ़िर भी माता-पिता के साथ उनके घर में रहते हैं और अपनी कमाई से ऐश करते हैं वहां कौन करेगा ऐसी चीज़ पर पैसा खर्च?
भारत की जनता करेगी!
इतना पैसा है जनता के पास?
पता नहीं!

मुझे समझ नहीं आया हां बोलू या ना! अभी भी पशोपेश में हूँ!

Sunday, July 20, 2008 7:08:36 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

वाह री आलस्यधारी की व्यस्तता! काफ़ी दिन से कुछ लिखा नही - “जरा व्यस्त था!” व्यस्तता फ़ैशन मे है इस लिए नही, कुछ बचे हुए काम निपटा रहा था! बचे हुए काम यानी वो काम नही जो शुरू ही नही किए गए, बल्की वो काम जो शुरू तो किए गए पर कभी सिरे नही पहुंचाए गए. जैसे की फ़्रिज मे इकट्ठी हुई वो बची सब्जियां जिन्हें खत्म करने के चक्कर में एक दिन खाना बनाने कि छुट्टी हो जाती है वैसे ही इन बचे हुए कामों में कई दिन गुज़र जाते हैं! इसे समझ पता उस से पहले ही मैं भी एक रीसर्च करने लग पडा जो अपने आप मे एक और बचा हुआ काम बन गई है! वैसे तो आजकल गूगल पर अपने काम की साईट ढूंढ निकालना भी रीसर्च की श्रेणी में डाला जाता है लेकिन ये मामला अलग है. इस मे गूगल के अलावा याहू को भी झोंका गया था.

दर-असल मामला मीर की गज़ल से शुरु हुआ, मैं बचे काम निपटाता गज़लें सुन रहा था. एक शेर सुना और मैं आलसीयों पर शोध करने मे व्यस्त हो गया. वैसे तो ये शोध भी बहुत आलस में कर रहा हूं लेकिन इस के चलते मैं मेरे सबसे प्रिय मीर की परी रूह, उनकी जान-ए-गज़ल को एक नई रौशनी मे देख पाया हूं.

‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

नीम-बाज़ = अध-खुली

कहना ना होगा की मीर की जान-ए-गज़ल से कमतर कोई किरदार इस शोध से न्याय भी नही कर सकता था. गुणवत्ता के इस अनुपम मिलाप के नतीजे सामने हैं - शुरुआती नतीजा ये है की मीर की महबूबा सोने मे बडी उस्ताद और आलसी थी इसीलिए मीर महान हुए.  उपर वाले शेर में शायर मीर को अपनी आलसी मेहबूबा की उनींदी आँखे भी शराबी की आँखो जैसी मस्त लग रही हैं - उस के आलस्य का प्रभाव देखिये मीर एक झटके में गालिब से आगे निकल गए. भरोसा नही हो रहा? चलो देखो - मीर एक दूसरे शेर मे कहते हैं -

मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
कहां हम, कहां तुम, कहां फिर जवानी

शिकायत करूं हूं तो सोने लगे है
मेरी सर-गुज़िश्त अब हुई है कहानी

अव्वल तो मीर को उनकी परी रूह मिलती नही, मिलती है तो सो जाती है! मीर अपनी स्लीपिंग ब्यूटी पर शायरियां लिख कर अमर हो जाते हैं. महबूबा शायरियां झेलती सोई या सोई और फ़िर शायरियां की गईं ये विवाद का विषय है. फ़िर भी यह तय है की किसी भी स्थिती में, अगर मीर की महबूबा आलसी नही होती तो मीर महान नही होते. वो तो तारीफ़ कर के ही महान हो गए. ऐसी है आलसियों की महिमा!

शोध के पक्ष में आगे मीर की एक गज़ल है पहला शेर बहूत कंफ़्यूजिंग है. मीर क्लासीक शायर थे - ऐसे शेर का मतलब बनाने की जरूरत नही होती थी उस का मतलब होता था जिसे समझने की जरूरत होती थी लेकिन  इस वाली गज़ल मे मामला अलग है

गुल को महबूब में कयास किया
फ़र्क निकला बहुत जो बास किया

दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना
एक आलम से रू-शिनास किया

कयास=विचार, रुउ-शिनास=परिचित, बास किया = गंध सूंधी

मीर की महबूबा खूबसूरत तो थी लेकिन नहाती नही थी. उपर से डीयो भी नही लगाती थी. तभी जब मीर ने “बास” किया तो फ़र्क निकला! और इस की परिणिती में लिखी गई गजल मेरी रिसर्च का आधार स्तंभ बनी. तो उपरोक्त शेर मे मीर कह रहे हैं महबूबा दिखने में फ़ूल जैसी है मगर बास रही है (चूंकी आलस्य के मारे नहाई नही है).

वैसे शेर में बास का मतलब है खुशबू लेकिन इसे क्रिया के समान भिडा कर मीर ने एक और कमाल कर दिया. जैसा की स्पष्ट परिलक्षित है, आलस की और इन्टर्नेट की महिमा के चलते इस शोध के लिए किसी उस्ताद को गाईड नही बनाया गया है. शायरी या किसी भी किस्म की “कला” को समझने के पॉप और माडर्न रास्तों को मानते हुए मैनें शायरी को महसूस करने की कोशिश की और मीर की महानता के राज़ खुलने लगे!

हर जीव का एक स्थायीभाव होता है. जैसे मच्छर का स्थायीभाव है भिनभिनाना, बंदर का उछलना-कूदना - बिला वजह की व्यस्तता ऐसी व्यस्तता जिसका उत्पादकता से कोई सह-संबंध नही है. वहीं दूसरी तरफ़ अजगर/रीछ/साण्ड का स्थायी भाव है पडे/खडे रहना - आलस्य का सौंदर्य वाह! अचानक किसी फ़ितूर या आवश्यकता के दबाव में अल्पकालिक क्रियाशीलता और दोबारा पूर्वावस्था को प्राप्त होना. आलस्य का स्थायीभाव क्रियाशीलता की गति को भी तेज कर देता है - काम निपटे और फ़िर अपन जहां पडें वहां सडें! मीर की नायिका इस दूसरी श्रेणी की जीव है और उसका सौंदर्य कोई मीर जैसा ही समझ सकता है! उसका अलसाया हुआ बासता हुआ सौंदर्य, उस की सही व्याख्या ही मीर को महान बना देती है.

आज तक ये माना जाता था की यही आलसी जीव जब क्रीयाशील होता है तो जैसे एक ही बार में आगे पीछे की सारी कसर निकाल देता है. सारी संचित उर्जा का सदुपयोग हो जाता है! जैसे साण्ड भडक कर किसी का पीछा करने लगे. देखा गया है ऐन मौके पर अचानक साण्ड रुक जाता है पीछा करता है -आक्रमण नहीं. मेरी शोध का नतीजा है की आलस्य क्रियाशीलता के दौरान भी हावी होता है और उसका प्रभाव होता है. कैसे? - आलसी जीव काम करता है लेकिन अधूरा करता है और बाकी काम औरों के करने के लिए छोड देता है. ठीक वैसे ही जैसे मीर की नायिका मिलने तो आती है पर अनुग्रहित किए बिना सो जाती है. अब अनुग्रहित करने का काम कोई और करे - जान-ए-गज़ल है क्या कम है! काम पूरा होने से पहले आलस्य दोबारा जकड लेता है.

दिल-ए-पुर-खूं की इक गुलाबी से
उम्र भर हम रहे शराबी से

दिल दहल जाये है सहर से आह
रात गुज़ारी किस खराबी से

खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आँखों की नीम ख्वाबी से

[नीम_ख्वाबी = उनींदी/अधखुली/नींद से उठी हुई]

स्लीपिंग ब्यूटी अनुग्रहित करने अंखियां खोलती है और लो, आलस्य जकड लेता है फ़िर सो जाती है. रात खराबी मे गुजर रही है, मीर खुन्नस में नही आते वरन आलस्य की महिमा पे न्यौछावर होते उम्र बिता रहे हैं. काश सारे आलसी मीर की परी रूह जैसी किस्मत ले कर आए होते, बिना कुछ किए धरे नाम कमा चुके होते. रह रह के याद दिलाता है कोई - बहुत से बाकी काम बाकी पडे हैं! खैर.. हां शोध जारी रहेगी!

Sunday, July 20, 2008 7:03:11 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, July 18, 2008
प्यार को कभी भी किया नहीं जा सकता।
प्यार तो अपने आप हो जाता है।
दिन और रात... धरती और आसमान, एक दूसरे के बिना सब अधूरे हैं।
सन -सन करती हवाएं, सुन्दर नजारे, फूलों की खुशबू ... सभी में छिपा होता है प्यार...
कुछ तो प्यार में हारकर भी जीत जाते हैं,
तो कुछ जीतकर भी अपना प्यार हार जाते हैं।
प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें जो डूबता है वो ही पार होता है।
प्यार पर किसी का वश नहीं होता....
अगर आप भी प्यार महसूस करना चाहते हैं तो डूबिये किसी के प्यार में ...
दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है ढाई आखर का प्यार...
जब आप भी किसी को चाहने लगते हैं तो उसके दूर होने पर भी आपको नजदीक होने का अहसास होने लगता है ,
हर चेहरे में आप उसका चेहरा ढूंढने की असफल कोशिश करते हैं,
कोई पल ऐसा न गुजरता होगा जब उसका नाम आपके होठों पर न रहता हो ...
यही तो होता है प्यार...
सुन्दर, सुखद , निश्छल और पवित्र अहसास।
पूरी दुनिया के सुख इस प्रेम में समाए हुए हैं।
यह शब्द छोटा होते हुए भी सभी शब्दों में बड़ा महसूस होता है।
केवल इतना सा अहसास मात्र ही आपको तरंगित कर देगा कि मैं उससे प्यार करता या करती हूं
 
Mind it............
Friday, July 18, 2008 9:48:04 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
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