Sunday, November 02, 2008

जब सीना ग़म से बोझल हो, और याद किसी की आती हो!
तब कमरे में बंद हो जाना, और चुपके चुपके रो लेना!!
जब आंखें बागी हो जायें, और याद में मेरी भर आयें!
फिर खुद को धोका मत देना, और चुपके चुपके रो लेना!!
जब पलकें दर्द से मूंदी हो, और सब समझें तुम सोते हो!
तब मुहँ पर तक्या रख लेना, और चुपके चुपके रो लेना!!
यह दुनिया जालिम दुनिया है, तुम हर गम को भी सह लेना!
तुम सब के सामने चुप रहना, और चुपके चुपके रो लेना!!
जब बारिश चेहरा धो डाले, और अश्क भी बूँदें लगते हों!
वो लम्हा हरगिज़ मत खोना, और चुपके चुपके रो लेना!!

Sunday, November 02, 2008 8:18:35 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Saturday, October 11, 2008

दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
बल्कि दोस्त ही जिन्दगी बन जाते हैं, दोस्ती में..

जरुरत नहीं पडती, दोस्त की तस्वीर की.
देखो जो आईना तो दोस्त नज़र आते हैं, दोस्ती में..

येह तो बहाना है कि मिल नहीं पाये दोस्तों से आज..
दिल पे हाथ रखते ही एहसास उनके हो जाते हैं, दोस्ती में..

नाम की तो जरूरत हई नहीं पडती इस रिश्ते मे कभी..
पूछे नाम अपना ओर, दोस्तॊं का बताते हैं, दोस्ती में..

कौन केहता है कि दोस्त हो सकते हैं जुदा कभी..
दूर रेह्कर भी दोस्त, बिल्कुल करीब नज़र आते हैं, दोस्ती में..

सिर्फ़ भ्रम हे कि दोस्त होते ह अलग-अलग..
दर्द हो इनको ओर, आंसू उनके आते हैं , दोस्ती में..

माना इश्क है खुदा, प्यार करने वालों के लिये अभी
पर हम तो अपना सिर झुकाते हैं, दोस्ती में..

ओर एक ही दवा है गम की दुनिया में क्युकि..
भूल के सारे गम, दोस्तों के साथ मुस्कुराते

Saturday, October 11, 2008 11:03:59 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

फूलों सी नाजुक चीज है दोस्ती,

सुर्ख गुलाब की महक है दोस्ती,

सदा हँसने हँसाने वाला पल है दोस्ती,

दुखों के सागर में एक कश्ती है दोस्ती,

काँटों के दामन में महकता फूल है दोस्ती,

जिंदगी भर साथ निभाने वाला रिश्ता है दोस्ती,

रिश्तों की नाजुकता समझाती है दोस्ती,

रिश्तों में विश्वास दिलाती है दोस्ती,

तन्हाई में सहारा है दोस्ती,

मझधार में किनारा है दोस्ती,

जिंदगी भर जीवन में महकती है दोस्ती,

किसी-किसी के नसीब में आती है दोस्ती,

हर खुशी हर गम का सहारा है दोस्ती,

हर आँख में बसने वाला नजारा है दोस्ती,

कमी है इस जमीं पर पूजने वालों की वरना इस जमीं पर "भगवान" है दोस्ती

Saturday, October 11, 2008 10:57:49 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

अभी शादी का पहला ही साल था,
ख़ुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,

ख़ुशियाँ कुछ यूँ उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभाल रही थी,

सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना
थोड़ा शर्माते हुए हमे नीद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हुमरे बालों मे फिराना,
मुस्कुराते हुए कहना की डार्लिंग चाय तो पी लो,

जल्दी से रेडी हो जाओ, आप को ऑफीस भी है जाना.
घरवाली भगवान का रूप ले कर आई थी,
दिल ओर दिमाग़ पर पूरी तरह छाई थी,
साँस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
इक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था.
.
.
.
5 साल बाद……..
.
.
.
सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना,
टेबल पैर रख कर ज़ोर से चिल्लाना,

आज ऑफीस जाओ तो मुन्ना को
स्कूल छोड़ते हुए जाना…………..

एक बार फिर वोही आवाज़ आई,
क्या बात है अभी तक छोड़ी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर ख़ुद ही संभाल लेना.

ना जाने घरवाली कैसा रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग़ पे काली घटा छाई थी,
साँस भी लेते है तो उन्ही का ख़याल होता है,
हर समय ज़ेहन मैं एक ही सवाल होता है,
क्या कभी वो दिन लौट के आएँगे, हम एक बार फिर कुवारें नही हो सकते?

Saturday, October 11, 2008 10:52:05 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,

ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,

कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,

उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,

मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,

उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया की बीच मँझदार मे,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,

अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,

यूँ तो 'मित्र' का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए!

Saturday, October 11, 2008 10:48:31 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

Saturday, October 11, 2008 6:48:51 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं,
मैं.. खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं,
मैं.. दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है.. दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं,
मैं.. जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..
साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं,
मैं.. वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना.. तन्हाई साथ है मेरे,
इतना बताना चाह्ता हूं..
ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..
मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं,
मैं.. बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा अभी..
हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं,
मैं.. एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं,
मैं.. खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता
इस छोटी सी जिन्दगी के,
गिले-शिकवे मिटाना चाहता हूँ,
सबको अपना कह सकूँ,
ऐसा ठिकाना चाहता हूँ,
टूटे तारों को जोड़ कर,
फिर आजमाना चाहता हूँ,
बिछुड़े जनों से स्नेह का,
मंदिर बनाना चाहता हूँ.
हर अन्धेरे घर मे फिर,
दीपक जलाना चाहता हूँ,
खुला आकाश मे हो घर मेरा,
नही आशियाना चाहता हूँ,
जो कुछ दिया खुदा ने,
दूना लौटाना चाहता हूँ,
जब तक रहे ये जिन्दगी,
खुशियाँ लुटाना चाहता हूँ

Saturday, October 11, 2008 12:04:53 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Thursday, October 09, 2008

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं

आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।

शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या

घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के


औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर

पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो

इक पथराई सी मुस्कान लिए

बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।


जब धुआँ देता, लगातार पुजारी

घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर

इक जरा छींक ही दो तुम,

तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

:: गुलज़ार ::

Thursday, October 09, 2008 4:38:40 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Sunday, October 05, 2008

अपनी फ़ितरत वो कब बदलता है
साँप जो आस्तीं में पलता है

दिल में अरमान जो मचलता है
शेर बन कर ग़ज़ल में ढलता है

मुझको अपने वजूद का एहसास
इक छ्लावा-सा बन के छलता है

जब जुनूँ हद से गुज़र जाये तो
आगही का चराग़ जलता है

उसको मत रहनुमा समझ लेना
दो क़दम ही जो साथ चलता है

वो है मौजूद मेरी नस—नस में
जैसे सीने में दर्द पलता है

रिन्द ‘गौतम’! उसे नहीं कहते
पी के थोड़ी-सी जो उछलता है.

Sunday, October 05, 2008 10:44:23 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

खोये-खोये-से हो हुआ क्या है?
कुछ बताओ ये माजरा क्या है?

भूल कर ख़ुद को भी नहीं चाहा
ये बताओ मेरी ख़ता क्या है?

जाये परदेस कोई फिर ये कहे
अजनबी क्या है, आशना क्या है

नाम लेते हैं तेरा जीने को
और फ़क़ीरों का आसरा क्या है?

दिल लगाते किसी से तो कहते
बेवफ़ाई है क्या वफ़ा क्या है

आदमीयत के जो पुजारी हैं
वो नहीं जानते ख़ुदा क्या है

पूछ लो प्यार करने वालों से
प्यार के जुर्म की सज़ा क्या है?

ग़म ज़ियादा हैं कम ख़ुशी ‘गौतम’!
और इस बज़्म में धरा क्या है?

Sunday, October 05, 2008 10:41:01 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

ना-तजुर्बाकारी से वाइज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है

वाइज़= धर्मोपदेशक

उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना
मक़सूद है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है

मक़सूद= मनोरथ

वाँ दिल में कि सदमे दो या जी में के सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती हम हैं तो ख़ुदा भी है

अनवार-ए-इलाही= दैवी प्रकाश

सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहे काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है

::: अकबर इलाहाबादी :::

Sunday, October 05, 2008 10:39:18 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
इक ज़रूरत से जाता था बाज़ार
ज़ोफ-ए-पीरी से खम हुई थी कमर
राह बेचारा चलता था रुक कर
चन्द लड़कों को उस पे आई हँसी
क़द पे फबती कमान की सूझी
कहा इक लड़के ने ये उससे कि बोल
तूने कितने में ली कमान ये मोल
पीर मर्द-ए-लतीफ़-ओ-दानिश मन्द
हँस के कहने लगा कि ए फ़रज़न्द
पहुँचोगे मेरी उम्र को जिस आन
मुफ़्त में मिल जाएगी तुम्हें ये कमान

::: अकबर इलाहाबादी :::

Sunday, October 05, 2008 10:36:48 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी
निकलती हैं दुआऎं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर

तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था
मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर

न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे
मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर

हक़ीक़त में मैं एक बुल्बुल हूँ मगर चारे की ख्वाहिश में
बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर

निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनू है
सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर

                             ::: अकबर इलाहाबादी :::

Sunday, October 05, 2008 10:34:57 PM (India Standard Time, UTC+05:30)

कल मैने खुदा से पूछा कि खूबसूरती क्या है?
तो वो बोले


खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है
खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए
खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए
खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे
खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो
खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ
खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ
खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ
खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए
खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ
खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल

Sunday, October 05, 2008 9:03:15 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Wednesday, September 17, 2008

बहते अश्को की ज़ुबान नही होती,
लफ़्ज़ों मे मोहब्बत बयां नही होती,
मिले जो प्यार तो कदर करना,
किस्मत हर कीसी पर मेहरबां नही होती.

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला कर रखना ।

Wednesday, September 17, 2008 8:40:23 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Tuesday, September 16, 2008

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फ़िर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फ़िर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फ़िर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं,मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

                                                  —   हरिवंशराय बच्चन

Tuesday, September 16, 2008 6:08:35 PM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 29, 2008

वक़्त रात का था
सब सो गए थे
आँखे मगर मेरी
लगातार सजल थी
ज्यूँ छत का पंखा
लगातार चकरा रहा था
तस्वीर कई तरह की
उभरी ज़हन में और मिट गयी
पलकें झपकी नहीं थी कही देर से
धीमी रौशनी झिलमिलाती रही भीगी आँखों में

पलकें नहीं झपकी यूँ आँखे सजल थी ???
या आँखे सजल थी यूँ पलकें नहीं झपकी ???

कई ख्याल मन को चौंका रहे थे

हाँ यही तो कहा था उसने जाते जाते

हालत और बदतर हो जाएंगे
हालत और बदतर हो जाएंगे

क्यूँ कहा समझ नहीं पा रहा था
धमकी थी या चेता रहा था
बहुत क्रूर मगर उसका कहा था
असर उन बोलों का कैसे कहूं मैं
नींद आँखों से दूर थी कोसो
और चाहत भी नहीं के अब पास आये

पंखे सा लगातार चकरा रहा हूँ
ख्यालों को दीवारों से टकरा रहा हूँ.
ख्यालों को दीवारों से टकरा रहा हूँ.

Friday, August 29, 2008 1:15:38 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

सरे शाम से चल रही थी पुरवाई
जिक्र उसका हुआ आँख भर आई

अहमियत उसकी क्या है बतलायें
वो इक जिस्म जिसकी मैं परछाई

खामोशी को मेरी बुज़दिली न समझो
ब्यान-ए-इश्क में है प्यार की रुसवाई

मिलना उसका अब नामुमकिन है
बारहा दिल को बात ये समझाई

गयी बूंदे कुरेद सूखे ज़ख्मों को
बरखा ये अज़ब रंग लाई||

Friday, August 29, 2008 1:14:20 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

शरबती आँख में फैला है काजल के यूँ
लरजती शाम में श्यामल सा बादल के यूँ

खूबसूरती तमाम खुदा ने लुटा दी यहीं
ओढा है वादी ने धुंध का आँचल के यूँ

तो भी साथ होता है जब वो नहीं होता
दिमाग-ओ-दिल में है मची खलबल के यूँ

कुछ अल्फाज़ ले कर चन्द खुश लम्हों से
है संवारी सजाई मैने ग़ज़ल के यूँ

Friday, August 29, 2008 1:13:26 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

चंद लम्हाते हिज्र का तमाशा देखो
आब-ओ-दाना है यूँ कर उजड़ता देखो

बानगी वस्ल के लम्हों की क्या बतलायें
मिला हो रोते बच्चे को खिलौना देखो

भागती दौड़ती ज़िन्दगी की मसरुफियत में
हुआ है गुम यहीं-कहीं बचपना देखो

वो शख्स इक बूँद की गुजारिश थी जिसे
सागर है मिला फिर भी मचलता देखो

वो 'मारीच' है कभी भी मिल न पाएगा
क्यों बंद आँख से उसे बारहा देखो

ज़ाहिर हो चले राज़ वहशत के सभी
क्यों उस वहशी में तुम रहनुमा देखो

दीवाना है लगे वो कही ‘गौतम’ तो नहीं
देखो गौर से उसे एं दोस्त ज़रा देखो

Friday, August 29, 2008 1:13:03 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

रात पूनम की है हर शख्स आहें भरता है
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़-रोज़ उतरता है

वो उड़ती जुल्फ वो काजल वो गुलाबी सी हया
वो सादगी में भी इक नूर सा निखरता है

बरसते भीगते मौसम पे है नशा तारी
के उसके हुस्न के जलवे से कौन उभरता है

अज़ब फ़साना-e-महफिल है होश गुम हैं सभी
ज़रा ही देर वो बेपर्दा जो गुजरता है

वो दोस्त था निगेबाँ था मेरी वफाओं का
दिल आज भी वहीँ अटका वही दम भरता है

जुस्तजू उसकी है ‘गौतम’, है आरजू-e-विसाल
क्या कहूं कैसे कहूं सोचता दिल डरता है

Friday, August 29, 2008 1:12:28 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
मै पागल हूं
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में मचलती रहती हैं
बेचैन रुह भटकती रही
चैन की इक सांस को दिल की धड़कन मचलती रहती हैं
बारिश भी तो थमती नहीं
दिल की धड़कन गरजने को मचलती रहती हैं
जनाज़ा कब्र का करता रहा इन्तज़ार
ज़िन्दा लाश दिल की धड़कन रुकने को मचलती रहती हैं
Friday, August 29, 2008 1:09:37 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

अब तो कोई एहसास ही बाक़ी ना रहा
दिल का कोई तमन्ना ना रहा
टूट गये है दिल के रिश्ते ऐसे
अब तो जीने की तमन्ना ना रहा..

हालत कुछ एस ही बदल गये
जो अपने थे सब ग़ैर हो गये
क्या जाने क्या हो गया
साथ जिनका था सब दूर हो गये

मंज़िल जो थी ..अब तो सोचने को मजबूर हुए
जाने क्यूं इतने कमज़ोर हुए
एक पल मे राह चलते ,जाने ये क्या हुआ
एक ही दास्तान के दो टुकड़े और हुए.

Friday, August 29, 2008 1:09:10 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
सफ़र तन्हा , रास्ता तन्हा
ज़िंदगी का ये कारवाँ तन्हा


साथी मिले , साथी चले
चल पड़े हम भी आगे तन्हा

साथ उसका होगा ना होगा , उलझाने बहुत
और ख़याल तन्हा

सफ़र तन्हा रास्ता तन्हा
ज़िंदगी का ये कारवाँ तन्हा

रिश्ते छूटे साथ छूटा
निकले है हम इस कदर तन्हा

ढूँढने को अपनी मंज़िल, चल रहा
हर शख्स तन्हा......
Friday, August 29, 2008 1:08:09 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
वो देख ना चाँद को, कितना चमकता हैं माँ.....
नीचे क्यों नहीं आता, क्या वो इतना डरता हैं माँ....

रोज़ रात को सपना आता हैं मुझे,
खुदा भी धरती पर उतरता हैं माँ...
तू जब भी मुँह खोलती हैं,
तब मुझसे वो बात करता हैं माँ....

ये आँखे क्यों भीग गयी तेरी,
क्यों आंसू पलकों पे ठहरता हैं माँ,
उधर देख वो चिडियों का घर,
वो चूजा कितना इतरता हैं माँ...

तू मुझे अकेला तो नहीं छोडेगी?
मेरा वक्त तुझ ही से गुज़रता हैं माँ...
Friday, August 29, 2008 1:03:45 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
कभी महसूस करो मुझे..
मेरे साथ बेठो, बाते‍ करो..
ख्याल ज़िन्दा हो उठे‍गे कि..
मैं ख्वाब देता हूँ..

शाम कि दहलीज़ से निकलकर..
रात के सिराहने से गुज़रता हुआ..
तुम्हारी हसीन आंखो का गुलाम..
तुम्हारी पलको पे रहता हुं...

महसूस करो मुझे भी कभी कि..
मैं ख्वाब देता हूँ‍..

यादों की उंगली पकड कर..
पलको की तामीर से फिसल कर...
होंठो पे मुस्कान बनकर..
हर दम तुम्हें खुश रखता हुं..

महसूस करो मुझे भी कभी कि...
मैं ख्वाब देता हूँ....

मैं वही हूँ , जिसे किसी दुआ में मांगा तुमने..
मैं वही हूँ, जिसे खुदा ने तुम्हें बक्शा..
बचपन की नामुराद चाहत का, नतीजा हुं मैं....
बचपन से हर वक्त तुम्हारे साथ रहता हुं..

अब तो महसूस करो मुझे भी कभी कि..
मैं ख्वाब देता हूँ....
Friday, August 29, 2008 1:00:01 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ‘ दीप ‘ को जला कर रखना
Friday, August 29, 2008 12:58:56 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
भभकता सूरज, गर्म हवाए, सूखती धरती..
मरते लोग...सब कुछ तो ठीक था....
हर साल यही तो होता हे..
फिर भी स्कूल से लौटी छुटकी ने
थेला रखकर आँगन मे..
जाने कौनसा गीत गाने लगी..
जोर-जोर से चिल्लाने लगी..
कि मानसून आने वाला हे
भाई मानसून आने वाला हे..

सत्तर पार की संतो काकी..
बैचेन होकर चारपाई से उतरी..
उछलती छुटकी का हाथ दबोचा..
लकडी से डराकर कहने लगी..
"मुई पेट भरने को दाना नहीं..
पानी का भी ठिकाना नहीं
घर की इस बिगडी हालत मे
किसको न्योता दे आई"
कि मानसून आने वाला हे
भाई मानसून आने वाला हे..

इतने मे छुटकी हाथ छुड़ाकर
भागी सरपट दुम दबाकर
गोद मे जाकर अपनी माँ को
हस-हसके समझा ने लगी
फिर दोनों उठकर बीच आँगन मे
हसते-हसते गाने लगी..
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं..

लछमन चाचा घर पर आया
उसको भी सबने समझाया
पुराने छप्पर को नया बनाओ
सूखे होज़ को साफ कराओ
इस बार ये पानी बह न जाए
छुटकी गौर से, बात बताने लगी..
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं ..

सूखी धरती पर हरियाली होगी
गायों कि बात निराली होगी
जब मिलेगा उनको खूब चारा
फिर बदलेगा वक़्त हमारा
देख आसमा, लछमन चाचा
मन ही मन गुनगुनाने लगा
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं..

अब संतो कि समझ में आया
दुआ में उसने हाथ उठाया
घर में फिर खुशहाली लादे
राधा कि फिर गोद भरादे
गीले आँगन में खेलता मुन्ना
सोच-सोच, इतराने लगी
बूढी आँखों से आंसू छलका कर
अब संतो काकी गाने लगी
कि मानसून आने वाला हैं
भाई मानसून आने वाला हैं.
Friday, August 29, 2008 12:58:04 AM (India Standard Time, UTC+05:30)

एक आरजू दिल में उठी हैं, पल भर में जो आंसू भुला दे
जिसमे रोना-धोना बच्चो सा, मुझको भी वो खेल सीखा दे

रबड़ कि गुडिया दिलावादे, चौराहे वाला पेड़ दिखा दे
मन्नू कान्हा गुड्डू श्यामा, अब्दुल जैसे दोस्त मिला दे

धक् धक् धक् धक् चुल्हा जलता, जिसकी आंच में रोटी सिकती
जिसमे हांडी का गुड-घी हो, वो मोटी वाली रोटी खिला दे

अब्दुल के अब्बा मारे डंडा, राधा की मौसी खेल खिलाये
कालूराम को छेड सके हम, ऐसी कोई जगह बता दे

घड़ी के कांटे चुभते हर दम, इनकी फिसलन को रुकवादे
प्यार के मारे भटके हम सब, सबको अपनी राह दिखा दे

थक के चूर हुआ हूँ मैं अब, नानी माँ की लोरी सूना दे
थपकी दे देकर हाथो से, बचपन वाली नींद सुला दे

Friday, August 29, 2008 12:56:51 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
सदियों से एक पहचान हूँ मैं..
नफ़रत से रहा अनजान हूँ मैं..
अब बूढी हुई आवाज़ मेरी
मेरे बेटो ...... हिन्दुस्तान हूँ मैं...

चुपचाप दुब्बक कर बैठा हूँ
अब अंगारों पे लेटा हूँ ...
तुम प्यार करो तो चैन मिले ...
देखो कितना परेशान हूँ मैं...

मेरे बेटों ...हिन्दुस्तान हूँ मैं...

क्यों जात-पात में उलझ गये...
मजहब को लेकर झुलस गये...
क्यों बूढे बाप को नोचते हो ....
अभी जिंदा एक जहान हूँ मैं....

मेरे बेटो ...हिन्दुस्तान हूँ मैं...

दिल्ली में धड़कता दिल हैं मेरा ...
मेरी सोच हिमालय में घूमती हैं...
पूरब पश्चिम में हाथ मेरे.....
दक्षिण को लहरे चूमती हैं.....

क्या अलग -अलग रह पाओगे ?
कई जिस्मो की एक जान हूँ मैं ...
ये बाप अभी तक जिंदा हैं ....
मेरे बेटों ..... हिन्दुस्तान हूँ मैं..
Friday, August 29, 2008 12:55:13 AM (India Standard Time, UTC+05:30)
 Friday, August 22, 2008
लोग बड़ी हस्ती बनने की
दौड़ में जुट जाते हैं
जो होते हैं अक्ल से लंगड़े
वह दर्शकों की भीड़ में बैठकर
ताली बजाए जाते हैं
अपने गम भुलाने के लिये
खुशियों के मनाने चैराहे पर देते धरना
आपस में झगड़ा कर वहां भी
अपने आंसू बहाये जाते हैं

देखते हैं मस्तराम ‘आवारा’
इतने ऊपर है चांद
पर उस पर लपकने के लिए
नीचे ही कई स्वांग रचाये जाते हैं
भागता आदमी जब थक जाता है
तब भी बैचेन रहता है कि
कहीं रौशनी उससे दूर न रह जाये
इसलिये अंधेरे के भय उसे सताये जाते हैं
अपने चिराग खुद ही जलाने की
आदत डाले रहते तो
क्यों गमों का गहरा समंदर
उनको डुबोये रहता
जहां जिंदगी तूफान झेलने की
ताकत रखती है
वहां मौत के डर बनाये जाते हैं