Thursday, October 23, 2008

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।

हदीसे-यार1 के उन्वाँ2 निखरने लगते हैं
तो हर हरीम3 में गेसू सँवरने लगते हैं

हर अजनबी हमें मजरम4 दिखाई देता है
जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

सबा से करते हैं ग़ुरबत-नसीब5 ज़िक्रे-वतन
वो चश्मे-सुबह में आँसू उभरने लगते हैं

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ो-लब6 की बख़ियागरी7
फ़िज़ा में और भी नग़मे बिखरने लगते हैं

दरे-क़फ़स8 पे अँधेरे की मुहर लगती है
तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं

1. प्रेमी के संवाद
2. शीर्षक
3. विशेष कक्ष, जहाँ पर्दा हो
4. जानने वाला
5. जिनकी किस्मत में परदेस में भटकना लिखा हो
6. शब्द और होंठ
7. सिलाई
8. पिंजरे का दरवाज़ा

Search
Navigation
On this page....
Archives
<October 2008>
SunMonTueWedThuFriSat
2829301234
567891011
12131415161718
19202122232425
2627282930311
2345678
Aggregate Me!
Feed your aggregator (RSS 2.0)
Categories
Blogroll
Contact me
Send mail to the author(s) E-mail
Themes
Pick a theme:
Administration