Sunday, September 14, 2008

ब्लैक होल का ख़तरा नहीं 

जेनेवा की मशीन चालू होते ही क्या पृथ्वी पर कोई ब्लैक होल बन जाएगा. अगर शीर्ष वैज्ञानिकों की मानें तो नहीं. लेकिन फिर भी कुछ गड़बड़ी की आशंका तो बनी हुई है ही. विज्ञान की कुछ पत्रिका तो इसे क़यामत की मशीन तक बता रही हैं.

स्विट्ज़रलैंड में जेनेवा के पास यूरोपीय मूलकण भौतिकी संस्थान सेर्न (CERN) संसार की एक ऐसी सबसे बड़ी प्रयोगशाला है, जिसने इस दिशा में क्रांतिकारी काम किये हैं और अब एक नयी ऊँचाई की ड्यौढ़ी पर खड़ी है. वहाँ पदार्थ के मूलकणों की गति बढ़ाते हुए उन्हें आपस में टकराने वाले संसार के अब तक के सबसे बड़े  ऐसे पार्टिकल एक्सिलरेटर (Particle Accelerator), अर्थात कणिका त्वरक का निर्माणकार्य पूरा होने वाला है, जो वैज्ञानिकों को ब्रह्मकण के दर्शन करा सकता है. लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (Large Hadron Collider)-- LHC--नामक इस त्वरक की सहायता से वैज्ञानिक उत्तर पाने की आशा कर रहे हैं कि ब्रह्मांड कैसे बना, किस चीज़ का बना हुआ है और वह कौन-सी शक्ति है, जो इस दुनिया को, ब्रह्मांड को, बाँधे हुए है?  लेकिन परीक्षण से पहले ही इस पर सवाल भी खड़े होने लगे हैं और यहां तक कहा जाने लगा है कि इससे पृथ्वी ब्लैक होल में बदल सकती है.

आशंका बेबुनियाद

27 किलोमीटर लंबी मशीनBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  27 किलोमीटर लंबी मशीन

लेकिन इस बीच पृथ्वी पर किसी ब्लैक होल के बनने और इसके नष्ट हो जाने की आशंका का पांच भौतिक वैज्ञानिकों ने एक साझे आकलन में खंडन किया है. उन्होंने लिखा है कि प्रकृति पृथ्वी पर अतीत में ऐसे लाखों प्रयोग कर चुकी है. इन वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रोटोन कणों को प्रकाश की गति से आपस में टकराने से यदि ब्लैक होल जैसे कोई कण बने भी, तो वे इतने सूक्ष्म होंगे कि तुरंत बिखर जायेंगे, क्योंकि उनमें अधिक समय तक बने रहने की ऊर्जा नहीं होगी. दो प्रोटोनों की टक्कर से जो ऊर्जा मुक्त होगी, वह दो मच्छरों के टकराने से पैदा हुई ऊर्जा के बराबर होगी, इसलिए कोई ऐसा ब्लैक होल नहीं बन पायेगा, जो पृथ्वी के अस्तित्व के लिए ख़तरा बन सके.

यहाँ इस समय एल एच सी नामक जिस महात्वरक को अंतिम रूप दिया  जा रहा है, वह वास्तव भूतल से कोई 100 मीटर की गहराई पर बनी 27 किलोमीटर लंबी एक वृत्ताकार सुरंग है, जिसमें तरह-तरह के पाइप, चुंबक, डिटेक्टर व अन्य उपकरण लगे हुए हैं.

15 मीटर लंबे, एक मीटर मोटे और 30 टन भारी पाइपों द्वारा आपस में जुड़े कुल 12 सौ अतिशक्तिशाली महाकाय चुंबक इस सुरंग में हइड्रोजन-नाभिकों, अर्थात प्रोटोनों को अपने चुंबकीय क्षेत्र में बनाए रखते हुए उनकी गति को त्वरित करेंगे और उन्हें आपस में टकराने पर विवश करेंगे. इस टक्कर से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होंगी, जैसी सृष्टि के जन्मदाता महाधमाके के समय रही होंगी और वैज्ञानिकों को भौतिक विज्ञान के कुछ मूलभूत प्रश्नों के उत्तर दे सकेंगी.

"हम यह जानने की आशा कर रहे हैं कि मूलकण किस चीज़ के बने हैं, इसकी व्याख्या करने वाला भौतिक शास्त्र का सर्वस्वीकृत मॉडल सही है या उसमें कोई फेरबदल करने पड़ेंगे. यह मॉडल, उदाहरण के लिए, यह नहीं बताता कि मूलकणों का एक निश्चित द्रव्यमान क्यों होता है? हम यह भी जानना चाहते हैं कि हिग्स-बोसोन  (Higgs-Boson) कहलाने वाले और भी सूक्षम कणों का अस्तित्व है भी या नहीं." -भौतिक वैज्ञानिक  फ़िलिप लेब्रून

क्या है सेर्न

मैर्केल भी देख चुकी हैं मशीनBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  मैर्केल भी देख चुकी हैं मशीन

हिग्स को ही इस समय ब्रह्मांड का ब्रह्मकण माना जा रहा है. समझा जाता है कि इस प्रकण के मिल जाने से इस प्रश्न का भी उत्तर मिल जायेगा कि क्वार्क (Quarks) और इलेक्ट्रॉनों को अपना द्रव्यमान (भार) कहाँ से मिला.

हिग्स-बोसोन मिल गये तो समझ लीजिये कि नोबेल पुरस्कार भी मिल गया. भौतिक विज्ञान के तथाकथित स्टैंडर्ड मॉडल का यही वह मर्म है, जिसकी सहायता से मूलकण भौतिकी के सारे प्रश्नों के उत्तर दिये जाते हैं, पर जिनका अस्तित्व अभी तक किसी प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं किया जा सका है. अब तक की प्रयोगशालाओं के त्वरक संभवतः इतने शक्तिशाली नहीं थे कि वे आपस में टराने वाले प्रोटोनों को पर्याप्त त्वरण-ऊर्जा प्रदान कर पाते.

सेर्न मूलकण भौतिकी के क्षेत्र में अनुसंधान का  विश्व का पहला केंद्र था. उसकी स्थापना यूरोप के 12 देशों ने मिल कर 1954 में की थी. इस समय फ्रांस के रोबेयर ऐयमार (Robert Aymar) उसके निदेशक हैं, किंतु 2009 में जर्मनी के रोल्फ़-डीटर स्विट्ज़रलैंड में सेर्न मुख्यालयBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  स्विट्ज़रलैंड में सेर्न मुख्यालय

होयर (Rolf-Dieter Heuer) निदेशक का पदभार संभालेंगे. इस समय 20 यूरोपीय देश सेर्न के सदस्य हैं और कोई तीन हज़ार लोग उसके नियमित कर्मचारी हैं. हर वर्ष दुनिया भर से लगभग 6 हज़ार वैज्ञानिक वहाँ शोधकार्य करने आते हैं. आज हम जिसे World Wide Web या Internet कहते हैं, उसका जन्म भी लगभग दो दशक पूर्व इसी प्रयोगशाला में हुआ था.

कैसे होगा प्रयोग

सेर्न का नया महात्वरक  एल एच सी प्रटोनों को लगभग प्रकाश जितनी गति प्रदान कर सकेगा--यानी लगभग तीन लाख किलोमीटर प्रतिसेकंड की गति. 27 किलोमीटर लंबी भूगर्भीय त्वरण रिंग में चल रहे आधे प्रोटोन घड़ी की सुई की अनुलोम और आधे विलोम दिशा से आते हुए  जहाँ आपस में टकरायेंगे, वहाँ एक बहुत ही कम समय के लिए एक बेहद घनी चिन्गारी- जैसी हरकत पैदा होगी. अनुमान है कि इस क्षणिक चिन्गारी में कुछ ऐसे नये कण,  प्रकण या उपकण हो सकते हैं, जो वैज्ञानिकों को सुराग दे सकते हैं कि वे सबसे मूल ईंटें कौन-सी हैं, जिनसे अणु-परमाणु और उनके इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन-जैसे संघटक अवयव बनते हैं और साथ ही  आपस में बाँधे भी रहते हैं.

प्रोटोनों की टक्करBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  प्रोटोनों की टक्कर

प्रोटोनों को  त्वरण रिंग में प्रति सेकंड 11 हज़ार बाहर एक-दूसरे की उलटी दिशा में दौड़ाया जायेगा और वे प्रति सेकंड 4 करोड़ बार आपस में टकरायेंगे. उन्हें उनके सही रास्ते पर दौड़ाने वाले चुंबकों को ठंडा रखने के लिए ऋण 270 डिग्री ठंडे तरल हीलियम की सहायता ली जायेगी.  त्वरण रिंग में होने वाली टक्कर को दर्ज करने के लिए सौ मीटर की गहराई पर चार बड़े-बड़े डिटेक्टर लगाये गये हैं. इन में एटलस नाम का सबसे बड़ा डिटेक्टर 25 मीटर व्यास वाला 46 मीटर ऊँचा एक विशालकाय यंत्र है. प्रटोनों की टक्कर और इस टक्कर से बनने वाले नये कणों को आँखों से देखा नहीं जा सकता, क्योंकि एक तो यह टक्कर एक सेकंड से भी लाखों-करोड़ों गुना अल्पकाल में पूरी हो जाती है और दूसरे, टक्कर से बने नये कण और भी कम समय में तुरंत बिखर जाते हैं.

डिक्टेर ऐसे महाकाय कैमरे हैं, जो बिखर रहे टुकड़ों की संख्या और उनके उड़नमार्ग को तुरंत माप सकते हैं. इन आँकड़ों की सहायता से वैज्ञानिक बाद में हिसाब लगा सकते हैं कि प्रोटोनों की टक्कर के समय कौन से नये कण-उपकण बने और बिखरे. इसी से यह सुराग भी मिल सकता है कि क्या उनके बीच हिग्स-बोसोन भी थे.

"एल एच सी और एटलस-जैसी परियोजनाओं पर कई-कई पीढ़ियों तक काम चालता है. मैं भाग्यशाली हूँ कि उस पीढ़ी के लिए काम कर रहा हूँ, जो इस डिटेक्टर और इस एक्सिलरेटर को चालू होते देखेगी. हमें दिलचस्प परिणाम और रोचक चीज़ें देखने को मिलेंगी." -जर्मन वैज्ञानिक क्लाउस बार्ट

रहस्यमयी पदार्थ

हिग्स-बोसोन के अलावा एक और ऐसे नये अतिसूक्ष्म मूलकण को लेकर वैज्ञानिक उत्साहित हैं, जिसे अंग्रेज़ी में Super Symmetric Particle, संक्षेप में SUSY (सूज़ी) कहते हैं. हिंदी में अर्थ हुआ अति समरूपी कण. सुपर सिमेट्रिक सिद्धांत का कहना है कि हर ज्ञात मूलकण का कहीं-न-कहीं एक और भी भारी प्रतिरूप होना चाहिये. जेनेवा में सेर्न प्रयोगशाला के नये सुपर त्वरक के द्वारा इस सिद्धांत की पुष्टि करने वाले कणों की भी खोज की जायेगी. बैज्ञानिकों के बीच अटकल लगायी जा रही है कि ब्रह्मांड में जिस तथाकथित  Dark Matter अर्थात काले द्रव्य की प्रधानता बतायी जाती है, वह कहीं  सुपर सिमेट्रिक कणों, यानी सूज़ी वाले कणों का ही तो नहीं बना है? काले द्रव्य या काले पदार्थ के बारे में कहा जाता है कि शायद यही रहस्यमय पदार्थ, किसी अदृश्य गोंद या सरेस की तरह,

तारकमंडलों और निहारिकाओं को बाँधे हुए है.

निश्चित है कि जेनेवा के नए त्वरक के चालू होते ही इन सारे प्रश्नों के उत्तर तुरंत नहीं मिल जायेंगे. इसमें समय लगेगा. वैसे, इस समय कुछ लोगों को यह प्रश्न सता रहा है कि नये त्वरक में प्रयोगों के दौरान यदि कहीं ऐसा कोई भारी पदार्थकण बना, जिससे ब्रह्मांड में मिलने वाले तथाकथित ब्लैक होल यानी काले विवर बने हैं, तब क्या होगा? ऐसा सुपर भारी कण बनते ही कहीं वह आसपास के अन्य कणों को खींच कर एक लघु ब्लैक होल तो नहीं बन जायेगा? पृथ्वी पर ब्लैक होल! इससे तो सत्यानाश ही पिट जायेगा! वह तो सारी पृथ्वी को निगल सकता है. ग़नीमत है कि शायद ही कोई वैज्ञानिक इसे संभव मानता है. सभी यही मानकर चल रहे हैं कि सेर्न का नया सुपर त्वरक ब्रह्मांड-रचना के सबसे मूल तत्वों के रहस्य को जानने की कुंजी सिद्ध होगा.

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