सरे शाम से चल रही थी पुरवाई
जिक्र उसका हुआ आँख भर आई
अहमियत उसकी क्या है बतलायें
वो इक जिस्म जिसकी मैं परछाई
खामोशी को मेरी बुज़दिली न समझो
ब्यान-ए-इश्क में है प्यार की रुसवाई
मिलना उसका अब नामुमकिन है
बारहा दिल को बात ये समझाई
गयी बूंदे कुरेद सूखे ज़ख्मों को
बरखा ये अज़ब रंग लाई||