एक आरजू दिल में उठी हैं, पल भर में जो आंसू भुला दे
जिसमे रोना-धोना बच्चो सा, मुझको भी वो खेल सीखा दे
रबड़ कि गुडिया दिलावादे, चौराहे वाला पेड़ दिखा दे
मन्नू कान्हा गुड्डू श्यामा, अब्दुल जैसे दोस्त मिला दे
धक् धक् धक् धक् चुल्हा जलता, जिसकी आंच में रोटी सिकती
जिसमे हांडी का गुड-घी हो, वो मोटी वाली रोटी खिला दे
अब्दुल के अब्बा मारे डंडा, राधा की मौसी खेल खिलाये
कालूराम को छेड सके हम, ऐसी कोई जगह बता दे
घड़ी के कांटे चुभते हर दम, इनकी फिसलन को रुकवादे
प्यार के मारे भटके हम सब, सबको अपनी राह दिखा दे
थक के चूर हुआ हूँ मैं अब, नानी माँ की लोरी सूना दे
थपकी दे देकर हाथो से, बचपन वाली नींद सुला दे