Sunday, August 17, 2008

कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों के साथ बहुत कुछ साथ है, कानों में घुलता संगीत, टेबल पर कुछ किताबें रखी हैं, पुखराज, वर्जित बाग की गाथा, कुछ अटके कुछ भटके, इन सभी के साथ शोभा डे का एक मोटा सा अंग्रेजी नॉवेल भी है- सुपर स्टार्स ऑफ इंडिया...........
ये सब मेरे साथ रोज ऑफिस आते हैं..........

उँगलियाँ अब भी चल रही है............

एक सौदा रात का एक कौड़ी चाँद की........

कानों में बज रहा है..........
दिमागी परतों पर करियर, पैसा, उम्र और समय का इम्प्रेशन बन रहा है, उसकी रेखाओं को थोड़ा और गहरा कर, उज्जवल भविष्य के सपनों के रंग भर रही हूँ..............
नज़र कभी-कभी मेज़ पर पड़ी किताबों पर पड़ रही है, जैसे पूछ रही हों उँगलियाँ थकी तो नहीं? पन्ने भी तो पलटने हैं तुम्हें इन्हीं उँगलियों से.....
गुलज़ार साहेब, मुदुला गर्ग, अमृता प्रीतम, और हाँ कुछ दिनों पहले शोभा डे को भी तो बुलवा लिया था............सबको एक उम्मीद की नज़र देकर समेटकर घर ले जाता हूँ.........
मेरी बहन के बच्चे जो थोडे दिनो पहले ही तो रहने आये थे मेरे घर... चॉकलेट का इंतज़ार कर रहे हैं, नीचे मेरी गाड़ी की आवाज़ के साथ ही बच्चों की आवाज़ें आ जाती है.....
किताबों को वादा करता हूँ, आज रात सारा काम निपटा कर अपनी नींद को ज़रूर धोखा दे दूँगा.........
सुबह हो गई है........किताबें जाग जाए इससे पहले उन्हें बेग में भरकर ऑफिस ले आता हूँ, कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों की खट-खट से सबकी नींद खुल जाती है.....
कुछ पल के लिए करियर के सपने से नज़रे चुरा ली तो आँखों में पुखराज चमकने लगा..........
लौ मेरी गोदी में पड़ा, रात की तन्हाई में
अकसर जिस्म जलता है तेरे जिस्म को छूने के लिए
हाथ उठते हैं तेरी लौ को पकड़ने के लिए
साँसें खिंच-खिंचके चटख जाती हैं तागों की तरह
हाँप जाती है बिलखती हुई बाँहों की तलाश
और हर बार यही सोचा है तन्हाई में मैंने
अपनी गोदी से उठाकर यह तेरी गोद में रख दूँ
रुह की आग में ये आग भी शामिल कर दूँ....गुलज़ार
पढ़ लिया...............लगा शायद कल रात किताबों के वादे के साथ एक वादा और भूल गई था..............

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